हि

अध्याय 2 · 9 / 71

2.9

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।
न योत्स्य इति गोविन्दामुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥

सञ्जयः उवाच—सञ्जय ने कहा; एवम्—इस प्रकार; उक्त्वा—कहकर; हृषीकेशम्—इन्द्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण से; गुडाकेशः—अज्ञान का दमन करने में निपुण अर्जुन; परन्तपः—शत्रुओं का दमन करने वाला; न योत्स्ये—मैं युद्ध नहीं करूँगा; इति—इस प्रकार; गोविन्दम्—आनन्ददाता श्रीकृष्ण से; उक्त्वा—कहकर; तूष्णीम्—मौन; बभूव—हो गया; ह—निश्चय ही।

सञ्जय ने कहा : इस प्रकार कहकर, शत्रुओं का दमन करने वाले अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा, “हे गोविन्द, मैं युद्ध नहीं करूँगा,” और मौन हो गए।

धृतराष्ट्र यह समझकर अवश्य ही अत्यन्त प्रसन्न हुए होंगे कि अर्जुन युद्ध नहीं करने जा रहे थे, अपितु युद्धभूमि को छोड़कर भिक्षावृत्ति की ओर जा रहे थे। किन्तु सञ्जय ने उन्हें यह बताकर पुनः निराश कर दिया कि अर्जुन अपने शत्रुओं का वध करने में समर्थ थे (परन्तपः)। यद्यपि अर्जुन उस समय पारिवारिक स्नेह के कारण मिथ्या शोक से अभिभूत थे, तथापि उन्होंने शिष्य के रूप में परम गुरु श्रीकृष्ण की शरण ली। इससे यह संकेत मिला कि वे शीघ्र ही पारिवारिक स्नेह से उत्पन्न मिथ्या शोक से मुक्त हो जाएँगे, और आत्म-साक्षात्कार, अथवा कृष्णभावनामृत के पूर्ण ज्ञान से प्रबुद्ध हो जाएँगे, और तब निश्चय ही युद्ध करेंगे। इस प्रकार धृतराष्ट्र का हर्ष विफल हो जाएगा, क्योंकि अर्जुन श्रीकृष्ण द्वारा प्रबुद्ध होकर अन्त तक युद्ध करेंगे।