अध्याय 5 · 1 / 27
5.1
अर्जुन उवाच
सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; सन्न्यासम्—त्याग; कर्मणाम्—समस्त कर्मों का; कृष्ण—हे कृष्ण; पुनः—फिर; योगम्—भक्ति; च—भी; शंससि—आप प्रशंसा करते हैं; यत्—जो; श्रेयः—कल्याणकारी है; एतयोः—इन दोनों में से; एकम्—एक; तत्—वह; मे—मुझसे; ब्रूहि—कृपया कहिए; सुनिश्चितम्—निश्चित रूप से।
अर्जुन ने कहा : हे कृष्ण, पहले तो आप मुझे कर्म त्यागने को कहते हैं, और फिर भक्ति-सहित कर्म की अनुशंसा करते हैं। अब कृपया मुझे निश्चित रूप से बताइए कि इन दोनों में से कौन-सा अधिक कल्याणकारी है?
भगवद्गीता के इस पाँचवें अध्याय में भगवान् कहते हैं कि भक्तिमय कर्म शुष्क मानसिक कल्पना से श्रेष्ठ है। भक्ति इस कल्पना की अपेक्षा सुगम है, क्योंकि दिव्य प्रकृति की होने के कारण वह मनुष्य को कर्मफल से मुक्त कर देती है। दूसरे अध्याय में आत्मा तथा उसके भौतिक देह में बन्धन का प्रारम्भिक ज्ञान समझाया गया था। उसी में यह भी समझाया गया था कि बुद्धियोग अर्थात् भक्ति के द्वारा इस भौतिक बन्धन से किस प्रकार निकला जाए। तीसरे अध्याय में यह समझाया गया कि जो व्यक्ति ज्ञान के स्तर पर स्थित है, उसका कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता। और चौथे अध्याय में भगवान् ने अर्जुन से कहा कि सभी प्रकार के यज्ञ-कर्म ज्ञान में पर्यवसित होते हैं। तथापि चौथे अध्याय के अन्त में भगवान् ने अर्जुन को पूर्ण ज्ञान में स्थित होकर जाग्रत हो युद्ध करने का परामर्श दिया। अतः भक्तिमय कर्म तथा ज्ञान में अकर्म—दोनों के महत्त्व पर एक साथ बल देकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को विमूढ़ कर दिया और उसके निश्चय को डाँवाँडोल कर दिया। अर्जुन समझता है कि ज्ञान में त्याग का अर्थ है इन्द्रिय-व्यापार के रूप में किए जाने वाले समस्त कर्मों की समाप्ति। किन्तु यदि कोई भक्तिमय कर्म करे, तो कर्म कैसे रुकता है? दूसरे शब्दों में, वह सोचता है कि संन्यास अर्थात् ज्ञान में त्याग सर्वथा समस्त प्रकार के कर्म से रहित होना चाहिए, क्योंकि कर्म और त्याग उसे परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वह यह नहीं समझ पाया कि पूर्ण ज्ञान में किया गया कर्म प्रतिक्रिया-रहित होता है और इसीलिए वह अकर्म के समान ही है। अतः वह पूछता है कि उसे कर्म पूर्णतः बन्द कर देना चाहिए, अथवा पूर्ण ज्ञान-सहित कर्म करना चाहिए।