अध्याय 5 · 2 / 27
5.2
श्रीभगवानुवाच
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥
श्रीभगवान् उवाच—श्रीभगवान् ने कहा; सन्न्यासः—कर्म का त्याग; कर्म-योगः—भक्तिमय कर्म; च—भी; निःश्रेयस-करौ—दोनों मुक्ति के पथ की ओर ले जाने वाले; उभौ—दोनों; तयोः—इन दोनों में से; तु—किन्तु; कर्म-सन्न्यासात्—सकाम कर्म के त्याग की तुलना में; कर्म-योगः—भक्तिमय कर्म; विशिष्यते—श्रेष्ठ है।
श्रीभगवान् ने कहा : कर्म का त्याग तथा भक्तिमय कर्म—दोनों मुक्ति के लिए श्रेयस्कर हैं। किन्तु इन दोनों में से कर्म-त्याग की अपेक्षा भक्तिमय कर्म श्रेष्ठ है।
सकाम कर्म (इन्द्रियतृप्ति की खोज) भौतिक बन्धन का कारण है। जब तक मनुष्य देहसुख के स्तर को सुधारने हेतु कर्मों में संलग्न रहता है, तब तक उसे निश्चित रूप से नाना प्रकार के शरीरों में देहान्तरण करना पड़ता है, और इस प्रकार भौतिक बन्धन निरन्तर चलता रहता है। श्रीमद्भागवत इसकी पुष्टि इस प्रकार करता है :
nūnaṁ pramattaḥ kurute vikarma yad indriya-prītaya āpṛṇoti
na sādhu manye yata ātmano ‘yam asann api kleśada āsa dehaḥ
parābhavas tāvad abodha-jāto yāvanna jijñāsata ātma-tattvam
yāvat kriyās tāvad idaṁ mano vai karmātmakaṁ yena śarīra-bandhaḥ
evaṁ manaḥ karma-vaśaṁ prayuṅkte avidyayātmany upadhīyamāne
prītir na yāvan mayi vāsudeve na mucyate deha-yogena tāvat
“लोग इन्द्रियतृप्ति के पीछे उन्मत्त हैं, और वे यह नहीं जानते कि दुःखों से परिपूर्ण यह वर्तमान शरीर भूतकाल के सकाम कर्मों का ही फल है। यद्यपि यह शरीर क्षणभंगुर है, फिर भी यह सदा अनेक प्रकार से कष्ट देता रहता है। अतः इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करना उचित नहीं है। जब तक मनुष्य सकाम कर्म के स्वरूप के विषय में कोई जिज्ञासा नहीं करता, तब तक उसे जीवन में असफल माना जाता है; क्योंकि जब तक मनुष्य इन्द्रियतृप्ति की चेतना में लीन रहता है, तब तक उसे एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करना पड़ता है। यद्यपि मन सकाम कर्मों में लीन हो और अज्ञान से प्रभावित हो, फिर भी मनुष्य को भगवान् वासुदेव की भक्ति के प्रति प्रेम विकसित करना चाहिए। केवल तभी उसे भौतिक अस्तित्व के बन्धन से निकलने का अवसर प्राप्त हो सकता है।” (भा. 5.5.4-6)
अतः मुक्ति के लिए केवल ज्ञान (अर्थात् यह ज्ञान कि मैं यह भौतिक शरीर नहीं, अपितु आत्मा हूँ) पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को आत्मा के स्तर पर कर्म करना होता है, अन्यथा भौतिक बन्धन से कोई छुटकारा नहीं है। किन्तु कृष्णभावनामृत में किया गया कर्म सकाम स्तर का कर्म नहीं है। पूर्ण ज्ञान में सम्पन्न किए गए कर्म वास्तविक ज्ञान में मनुष्य की उन्नति को सुदृढ़ करते हैं। कृष्णभावनामृत के बिना केवल सकाम कर्मों के त्याग से बद्धजीव का हृदय वास्तव में शुद्ध नहीं होता। जब तक हृदय शुद्ध नहीं होता, तब तक मनुष्य को सकाम स्तर पर कर्म करना पड़ता है। किन्तु कृष्णभावनामृत में किया गया कर्म मनुष्य को स्वतः ही सकाम कर्म के फल से बचने में सहायता करता है, जिससे उसे भौतिक स्तर पर उतरने की आवश्यकता नहीं रहती। अतएव कृष्णभावनामृत में कर्म सदैव त्याग से श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग में सदा पतन का भय रहता है। कृष्णभावनामृत के बिना त्याग अपूर्ण है, जैसा कि श्रील रूप गोस्वामी अपने भक्ति-रसामृत-सिन्धु में पुष्टि करते हैं।
prāpañcikatayā buddhyā hari-sambandhi-vastunaḥ
mumukṣubhiḥ parityāgo vairāgyaṁ phalgu kathyate.
“मुक्ति की कामना करने वाले व्यक्तियों के द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से सम्बन्धित वस्तुओं का त्याग, भले ही वे भौतिक हों, अपूर्ण त्याग कहलाता है।” त्याग तब पूर्ण होता है जब वह इस ज्ञान में हो कि अस्तित्व में जो कुछ है वह भगवान् का है और किसी को भी किसी वस्तु पर स्वामित्व का दावा नहीं करना चाहिए। मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वस्तुतः कोई भी वस्तु किसी की नहीं है। तब त्याग का प्रश्न ही कहाँ रह जाता है? जो जानता है कि सब कुछ श्रीकृष्ण की सम्पत्ति है, वह सदैव त्याग में स्थित रहता है। चूँकि सब कुछ श्रीकृष्ण का है, अतः सब कुछ श्रीकृष्ण की सेवा में लगाया जाना चाहिए। कृष्णभावनामृत में कर्म का यह पूर्ण रूप मायावादी सम्प्रदाय के किसी संन्यासी के कृत्रिम त्याग से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।