अध्याय 5 · 9 / 27
5.10
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १० ॥
ब्रह्मणि—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को; आधाय—अर्पित करके; कर्माणि—समस्त कर्म; सङ्गम्—आसक्ति; त्यक्त्वा—त्यागकर; करोति—करता है; यः—जो; लिप्यते—प्रभावित होता है; न—कभी नहीं; सः—वह; पापेन—पाप से; पद्म-पत्रम्—कमल का पत्ता; इव—के समान; अम्भसा—जल में।
जो अपना कर्तव्य आसक्ति-रहित होकर, फल को परमेश्वर को अर्पित करते हुए करता है, वह पापमय कर्म से उसी प्रकार प्रभावित नहीं होता, जिस प्रकार कमल का पत्ता जल से अछूता रहता है।
यहाँ ब्रह्मणि का अर्थ है कृष्णभावनामृत में। भौतिक जगत् भौतिक प्रकृति के तीन गुणों का समष्टि-प्रकटीकरण है, जिसे तकनीकी रूप से प्रधान कहते हैं। वैदिक मन्त्र—sarvam etad brahma, tasmād etad brahma nāma-rūpam annaṁ ca jāyate, तथा भगवद्गीता में mama yonir mahad brahma—यह संकेत करते हैं कि भौतिक जगत् में सब कुछ ब्रह्म का ही प्रकटीकरण है; और यद्यपि कार्य भिन्न-भिन्न रूप में प्रकट होते हैं, फिर भी वे कारण से अभिन्न हैं। ईशोपनिषद् में कहा गया है कि सब कुछ परब्रह्म अर्थात् श्रीकृष्ण से सम्बन्धित है, और इस प्रकार सब कुछ केवल उन्हीं का है। जो भली-भाँति जानता है कि सब कुछ श्रीकृष्ण का है, कि वे सब कुछ के स्वामी हैं और इसलिए सब कुछ भगवान् की सेवा में संलग्न है, उसका स्वभावतः अपने कर्मफलों से कोई सरोकार नहीं रहता, चाहे वे पुण्यमय हों या पापमय। यहाँ तक कि मनुष्य का भौतिक शरीर भी, जो किसी विशिष्ट प्रकार के कर्म को सम्पन्न करने हेतु भगवान् का उपहार है, कृष्णभावनामृत में संलग्न किया जा सकता है। वह पापमय प्रतिक्रियाओं के संदूषण से परे रहता है, ठीक उसी प्रकार जैसे कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी भीगता नहीं। भगवान् गीता में यह भी कहते हैं : mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasya: “समस्त कर्म मुझे [श्रीकृष्ण को] अर्पित कर दो।” निष्कर्ष यह है कि कृष्णभावनामृत-रहित व्यक्ति भौतिक शरीर तथा इन्द्रियों की धारणा के अनुसार कर्म करता है, किन्तु कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति इस ज्ञान के अनुसार कर्म करता है कि शरीर श्रीकृष्ण की सम्पत्ति है और इसलिए उसे श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न किया जाना चाहिए।