अध्याय 5 · 10 / 27
5.11
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ ११ ॥
कायेन—शरीर से; मनसा—मन से; बुद्ध्या—बुद्धि से; केवलैः—शुद्ध; इन्द्रियैः—इन्द्रियों से; अपि—यहाँ तक कि; योगिनः—कृष्णभावनाभावित व्यक्ति; कर्म—कर्म; कुर्वन्ति—वे करते हैं; सङ्गम्—आसक्ति; त्यक्त्वा—त्यागकर; आत्म—आत्मा; शुद्धये—शुद्धि के प्रयोजन से।
योगीगण आसक्ति त्यागकर, केवल शुद्धि के प्रयोजन से ही शरीर, मन, बुद्धि तथा यहाँ तक कि इन्द्रियों से कर्म करते हैं।
श्रीकृष्ण की इन्द्रियों की तृप्ति हेतु कृष्णभावनामृत में कर्म करने से कोई भी कर्म—चाहे वह शरीर का हो, मन का, बुद्धि का अथवा इन्द्रियों का—भौतिक संदूषण से शुद्ध हो जाता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के कर्मों से कोई भौतिक प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं होती। अतएव शुद्ध कर्म, जिन्हें सामान्यतः सदाचार कहते हैं, कृष्णभावनामृत में कर्म करने से सरलता से सम्पन्न किए जा सकते हैं। श्री रूप गोस्वामी अपने भक्ति-रसामृत-सिन्धु में इसका वर्णन इस प्रकार करते हैं :
īhā yasya harer dāsye karmaṇā manasā girā
nikhilāsv apy avasthāsu jīvanmuktaḥ sa ucyate
जो व्यक्ति अपने शरीर, मन, बुद्धि तथा वाणी से कृष्णभावनामृत में (अर्थात् दूसरे शब्दों में, श्रीकृष्ण की सेवा में) कर्म करता है, वह इस भौतिक जगत् में रहते हुए भी मुक्त है, यद्यपि वह अनेक तथाकथित भौतिक कर्मों में संलग्न प्रतीत हो। उसमें कोई मिथ्या अहंकार नहीं होता, न ही वह यह विश्वास करता है कि वह यह भौतिक शरीर है, अथवा कि शरीर उसका है। वह जानता है कि वह यह शरीर नहीं है और यह शरीर उसका नहीं है। वह स्वयं श्रीकृष्ण का है, और शरीर भी श्रीकृष्ण का है। जब वह शरीर, मन, बुद्धि, वाणी, जीवन, धन इत्यादि से उत्पन्न प्रत्येक वस्तु को—जो कुछ भी उसके अधिकार में हो—श्रीकृष्ण की सेवा में लगा देता है, तब वह तत्क्षण श्रीकृष्ण से युक्त हो जाता है। वह श्रीकृष्ण के साथ एक हो जाता है और उस मिथ्या अहंकार से रहित हो जाता है, जो मनुष्य को यह विश्वास कराता है कि वह शरीर इत्यादि है। यही कृष्णभावनामृत की पूर्ण अवस्था है।