अध्याय 5 · 8 / 27
5.8-9
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८ ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९ ॥
न—कभी नहीं; एव—निश्चय ही; किञ्चित्—कुछ भी; करोमि—मैं करता हूँ; इति—इस प्रकार; युक्तः—दिव्य चेतना में संलग्न; मन्येत—सोचता है; तत्त्ववित्—जो सत्य को जानता है; पश्यन्—देखते हुए; शृण्वन्—सुनते हुए; स्पृशन्—स्पर्श करते हुए; जिघ्रन्—सूँघते हुए; अश्नन्—खाते हुए; गच्छन्—जाते हुए; स्वपन्—स्वप्न देखते हुए; श्वसन्—श्वास लेते हुए; प्रलपन्—बोलते हुए; विसृजन्—त्यागते हुए; गृह्णन्—ग्रहण करते हुए; उन्मिषन्—खोलते हुए; निमिषन्—बन्द करते हुए; अपि—होने पर भी; इन्द्रियाणि—इन्द्रियाँ; इन्द्रिय-अर्थेषु—इन्द्रियतृप्ति में; वर्तन्ते—वे इस प्रकार संलग्न रहें; इति—इस प्रकार; धारयन्—विचार करते हुए।
दिव्य चेतना में स्थित व्यक्ति, यद्यपि देखने, सुनने, स्पर्श करने, सूँघने, खाने, चलने-फिरने, सोने तथा श्वास लेने में संलग्न रहता है, फिर भी वह अपने भीतर सदा जानता है कि वस्तुतः वह कुछ भी नहीं करता। क्योंकि बोलते, मल त्यागते, ग्रहण करते, अपनी आँखें खोलते अथवा बन्द करते हुए वह सदा जानता है कि केवल भौतिक इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में संलग्न हैं और वह उनसे पृथक् है।
कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति अपने अस्तित्व में शुद्ध होता है, और फलस्वरूप उसका ऐसे किसी कर्म से सरोकार नहीं रहता जो पाँच निकट तथा दूर के कारणों पर निर्भर हो : कर्ता, कर्म, परिस्थिति, प्रयास तथा भाग्य। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति में संलग्न रहता है। यद्यपि वह अपने शरीर तथा इन्द्रियों से कर्म करता प्रतीत होता है, फिर भी वह सदा अपनी वास्तविक स्थिति के प्रति सचेत रहता है, जो आध्यात्मिक प्रवृत्ति है। भौतिक चेतना में इन्द्रियाँ इन्द्रियतृप्ति में संलग्न रहती हैं, किन्तु कृष्णभावनामृत में इन्द्रियाँ श्रीकृष्ण की इन्द्रियों की तृप्ति में संलग्न रहती हैं। अतएव कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सदा मुक्त रहता है, यद्यपि वह इन्द्रिय-विषयों में संलग्न प्रतीत होता है। देखना, सुनना, बोलना, मल त्यागना इत्यादि क्रियाएँ कर्म के लिए इन्द्रियों के व्यापार हैं। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति इन्द्रियों की क्रियाओं से कभी प्रभावित नहीं होता। वह भगवान् की सेवा के अतिरिक्त कोई कर्म कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह जानता है कि वह भगवान् का नित्य सेवक है।