हि

अध्याय 5 · 11 / 27

5.12

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥

युक्तः—जो भक्ति में संलग्न है; कर्म-फलम्—समस्त कर्मों के फल; त्यक्त्वा—त्यागकर; शान्तिम्—पूर्ण शान्ति; आप्नोति—प्राप्त करता है; नैष्ठिकीम्—अविचल; अयुक्तः—जो कृष्णभावनामृत में नहीं है; काम-कारेण—कर्मफल का भोग करने हेतु; फले—फल में; सक्तः—आसक्त; निबध्यते—बँध जाता है।

दृढ़तापूर्वक भक्ति में संलग्न आत्मा अनन्य शान्ति प्राप्त करती है, क्योंकि वह समस्त कर्मों के फल मुझे अर्पित कर देती है; जबकि जो व्यक्ति भगवान् से युक्त नहीं है, जो अपने श्रम के फलों का लोभी है, वह बँध जाता है।

कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति तथा देहचेतना में स्थित व्यक्ति में यह भेद है कि पहला श्रीकृष्ण के प्रति आसक्त है, जबकि दूसरा अपने कर्मफलों के प्रति आसक्त है। जो व्यक्ति श्रीकृष्ण के प्रति आसक्त है और केवल उन्हीं के लिए कर्म करता है, वह निश्चित रूप से मुक्त व्यक्ति है, और वह सकाम पुरस्कारों के लिए व्याकुल नहीं रहता। भागवत में कर्मफल को लेकर व्याकुलता का कारण यह बताया गया है कि मनुष्य द्वैत की धारणा में कार्य करता है, अर्थात् परम सत्य के ज्ञान के बिना कार्य करता है। श्रीकृष्ण परम पूर्ण सत्य हैं, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। कृष्णभावनामृत में कोई द्वैत नहीं है। जो कुछ भी विद्यमान है वह श्रीकृष्ण की ऊर्जा का ही उत्पाद है, और श्रीकृष्ण सर्वमंगलमय हैं। अतएव कृष्णभावनामृत में किए गए कर्म परम स्तर पर हैं; वे दिव्य हैं और उनका कोई भौतिक प्रभाव नहीं होता। अतः मनुष्य कृष्णभावनामृत में शान्ति से परिपूर्ण रहता है। किन्तु जो इन्द्रियतृप्ति हेतु लाभ की गणना में बँधा रहता है, वह उस शान्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। कृष्णभावनामृत का यही रहस्य है—यह अनुभूति कि श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कोई अस्तित्व नहीं है, ही शान्ति तथा अभय का स्तर है।