अध्याय 5 · 12 / 27
5.13
सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥
सर्व—समस्त; कर्माणि—कर्म; मनसा—मन से; सन्न्यस्य—त्यागकर; आस्ते—रहता है; सुखम्—सुखपूर्वक; वशी—जो संयमी है; नव-द्वारे—जहाँ नौ द्वार हैं उस स्थान में; पुरे—नगरी में; देही—देहधारी आत्मा; न—कभी नहीं; एव—निश्चय ही; कुर्वन्—कुछ करते हुए; न—न; कारयन्—करवाते हुए।
जब देहधारी जीव अपने स्वभाव को वश में कर लेता है और मन से समस्त कर्मों का त्याग कर देता है, तब वह नौ द्वारों वाली नगरी (भौतिक शरीर) में सुखपूर्वक निवास करता है, न तो कर्म करता हुआ और न कर्म करवाता हुआ।
देहधारी आत्मा नौ द्वारों वाली नगरी में निवास करता है। शरीर के, अथवा शरीर रूपी आलंकारिक नगरी के कार्य प्रकृति के विशिष्ट गुणों द्वारा स्वतः ही संचालित होते हैं। आत्मा, यद्यपि स्वयं को शरीर की परिस्थितियों के अधीन कर देता है, फिर भी यदि वह चाहे तो उन परिस्थितियों से परे रह सकता है। केवल अपने श्रेष्ठ स्वरूप की विस्मृति के कारण ही वह स्वयं को भौतिक शरीर के साथ तादात्म्य कर लेता है, और इसलिए कष्ट भोगता है। कृष्णभावनामृत के द्वारा वह अपनी वास्तविक स्थिति को पुनः जाग्रत कर सकता है और इस प्रकार अपने देहबन्धन से निकल सकता है। अतएव जब मनुष्य कृष्णभावनामृत ग्रहण करता है, तब वह तत्क्षण शारीरिक कार्यों से पूर्णतः पृथक् हो जाता है। ऐसे संयमित जीवन में, जिसमें उसके विचार बदल जाते हैं, वह नौ द्वारों वाली नगरी के भीतर सुखपूर्वक निवास करता है। नौ द्वारों का वर्णन इस प्रकार किया गया है :
nava-dvāre pure dehī haṁso lelāyate bahiḥ
vaśī sarvasya lokasya sthāvarasya carasya ca.
“पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जो जीव के शरीर के भीतर निवास करते हैं, समग्र ब्रह्माण्ड में समस्त जीवों के नियन्ता हैं। शरीर में नौ द्वार हैं : दो नेत्र, दो नासाछिद्र, दो कान, एक मुख, गुदा तथा जननेन्द्रिय। जीव अपनी बद्ध अवस्था में स्वयं को शरीर के साथ तादात्म्य कर लेता है, किन्तु जब वह स्वयं को अपने भीतर स्थित भगवान् के साथ तादात्म्य करता है, तब वह शरीर में रहते हुए भी भगवान् के समान ही मुक्त हो जाता है।” (श्वेत. 3.18)
अतएव कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भौतिक शरीर के बाह्य तथा आन्तरिक—दोनों प्रकार के कार्यों से मुक्त रहता है।