अध्याय 5 · 13 / 27
5.14
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥
न—कभी नहीं; कर्तृत्वम्—स्वामित्व; न—न ही; कर्माणि—कर्म; लोकस्य—लोगों का; सृजति—रचता है; प्रभुः—शरीर रूपी नगरी का स्वामी; न—न ही; कर्म-फल—कर्मों के फल; संयोगम्—सम्बन्ध; स्वभावः—भौतिक प्रकृति के गुण; तु—किन्तु; प्रवर्तते—कार्य करते हैं।
देहधारी आत्मा, अपने शरीर रूपी नगरी का स्वामी, न तो कर्मों की रचना करता है, न लोगों को कर्म करने के लिए प्रेरित करता है, और न कर्म के फलों की रचना करता है। यह सब भौतिक प्रकृति के गुणों द्वारा सम्पादित होता है।
जीव, जैसा कि सातवें अध्याय में समझाया जाएगा, स्वभाव से परमेश्वर के साथ एक है, और पदार्थ से भिन्न है, जो भगवान् की एक अन्य प्रकृति है—जिसे अपरा कहते हैं। किसी प्रकार, श्रेष्ठ प्रकृति अर्थात् जीव अनादि काल से भौतिक प्रकृति के सम्पर्क में रहा है। जो क्षणभंगुर शरीर अथवा भौतिक निवास-स्थान उसे प्राप्त होता है, वही नाना प्रकार के कर्मों तथा उनकी परिणामी प्रतिक्रियाओं का कारण है। ऐसे बद्ध वातावरण में रहते हुए मनुष्य स्वयं को (अज्ञानवश) शरीर के साथ तादात्म्य करके शरीर के कर्मों के फल भोगता है। अनादि काल से प्राप्त यही अज्ञान शारीरिक कष्ट तथा दुःख का कारण है। ज्यों ही जीव शरीर के कर्मों से पृथक् हो जाता है, त्यों ही वह प्रतिक्रियाओं से भी मुक्त हो जाता है। जब तक वह शरीर रूपी नगरी में रहता है, तब तक वह उसका स्वामी प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में वह न तो उसका स्वामी है और न उसके कर्मों एवं प्रतिक्रियाओं का नियन्ता। वह तो केवल भौतिक सागर के मध्य अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। सागर की लहरें उसे उछाल रही हैं, और उन पर उसका कोई नियन्त्रण नहीं है। उसका सर्वोत्तम समाधान यह है कि वह दिव्य कृष्णभावनामृत के द्वारा जल से बाहर निकल आए। केवल वही उसे समस्त उथल-पुथल से बचाएगा।