अध्याय 5 · 14 / 27
5.15
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५ ॥
न—कभी नहीं; आदत्ते—ग्रहण करता है; कस्यचित्—किसी का; पापम्—पाप; न—न; च—भी; एव—निश्चय ही; सुकृतम्—पुण्य कर्म; विभुः—परमेश्वर; अज्ञानेन—अज्ञान से; आवृतम्—आच्छादित; ज्ञानम्—ज्ञान; तेन—उससे; मुह्यन्ति—मोहित होते हैं; जन्तवः—जीव।
परम चेतन परमात्मा न तो किसी के पापमय कर्मों को ग्रहण करते हैं, न पुण्य कर्मों को। तथापि देहधारी जीव मोहित रहते हैं, क्योंकि अज्ञान उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित कर देता है।
संस्कृत शब्द विभुः का अर्थ है परमेश्वर, जो असीम ज्ञान, ऐश्वर्य, बल, यश, सौन्दर्य तथा वैराग्य से परिपूर्ण हैं। वे सदा स्वयं में सन्तुष्ट रहते हैं, पापमय अथवा पुण्यमय कर्मों से अविचलित रहते हैं। वे किसी जीव के लिए कोई विशेष परिस्थिति नहीं रचते, अपितु जीव, अज्ञान से मोहित होकर, स्वयं को जीवन की कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में डाले जाने की इच्छा करता है, और इस प्रकार उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया की शृंखला आरम्भ हो जाती है। जीव श्रेष्ठ प्रकृति का होने के कारण ज्ञान से परिपूर्ण है। फिर भी, अपनी सीमित शक्ति के कारण वह अज्ञान से प्रभावित होने की प्रवृत्ति रखता है। भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं, किन्तु जीव नहीं। भगवान् विभु अर्थात् सर्वज्ञ हैं, किन्तु जीव अणु अर्थात् अणुरूप है। चूँकि वह चेतन आत्मा है, अतः उसमें अपनी स्वतन्त्र इच्छा से कामना करने की क्षमता है। ऐसी कामना केवल सर्वशक्तिमान् भगवान् द्वारा ही पूर्ण की जाती है। और इस प्रकार, जब जीव अपनी कामनाओं में मोहित हो जाता है, तब भगवान् उसे उन कामनाओं को पूर्ण करने देते हैं, किन्तु जिस विशिष्ट परिस्थिति की कामना की जाए, उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया के लिए भगवान् कभी उत्तरदायी नहीं होते। अतएव मोहित अवस्था में होने के कारण देहधारी आत्मा स्वयं को परिस्थितिजन्य भौतिक शरीर के साथ तादात्म्य कर लेता है और जीवन के क्षणभंगुर दुःख एवं सुख के अधीन हो जाता है। भगवान् परमात्मा अर्थात् अन्तर्यामी के रूप में जीव के नित्य संगी हैं, और इसलिए वे व्यष्टि आत्मा की कामनाओं को समझ सकते हैं, जैसे कोई फूल के निकट रहकर उसकी सुगन्ध को सूँघ सकता है। कामना जीव की बद्धता का एक सूक्ष्म रूप है। भगवान् उसकी कामना को उसकी पात्रता के अनुसार पूर्ण करते हैं : मनुष्य प्रस्ताव करता है, और भगवान् निर्णय करते हैं। अतः व्यष्टि अपनी कामनाओं को पूर्ण करने में सर्वशक्तिमान् नहीं है। तथापि भगवान् समस्त कामनाएँ पूर्ण कर सकते हैं, और भगवान्, सबके प्रति तटस्थ होने के कारण, सूक्ष्म स्वतन्त्र जीवों की कामनाओं में हस्तक्षेप नहीं करते। किन्तु जब कोई श्रीकृष्ण की कामना करता है, तब भगवान् विशेष ध्यान रखते हैं और उसे इस प्रकार कामना करने को प्रोत्साहित करते हैं कि वह उन्हें प्राप्त कर सके और नित्य सुखी हो सके। अतः वैदिक मन्त्र घोषणा करता है :
eṣa u hy eva sādhu karma kārayati taṁ yamebhyo lokebhya unninīṣate
eṣa u evāsādhu karma kārayati yamadho ninīṣate.
ajño jantur anīso ‘yam ātmanaḥ sukha-duḥkhayoḥ
īśvara-prerito gacchet svargaṁ vāśvabhram eva ca.
“भगवान् जीव को पुण्य कर्मों में संलग्न करते हैं, जिससे वह उन्नत हो सके। भगवान् उसे पापमय कर्मों में संलग्न करते हैं, जिससे वह नरक जाए। जीव अपने दुःख तथा सुख में पूर्णतः परतन्त्र है। परमेश्वर की इच्छा से वह स्वर्ग अथवा नरक जा सकता है, जैसे बादल वायु द्वारा प्रेरित होता है।”
अतएव देहधारी आत्मा, कृष्णभावनामृत से बचने की अपनी अनादि कामना के कारण, अपने मोह को स्वयं उत्पन्न करता है। फलस्वरूप, यद्यपि वह स्वरूपतः नित्य, आनन्दमय तथा ज्ञानमय है, फिर भी अपने अस्तित्व की लघुता के कारण वह भगवान् की सेवा की अपनी स्वरूपगत स्थिति को भूल जाता है और इस प्रकार अविद्या में फँस जाता है। और अज्ञान के वशीभूत होकर जीव यह दावा करता है कि उसके बद्ध अस्तित्व के लिए भगवान् उत्तरदायी हैं। वेदान्त-सूत्र भी इसकी पुष्टि करते हैं :
vaiṣamya-nairghṛṇye na sāpekṣatvāt tathā hi darśayati.
“भगवान् न किसी से घृणा करते हैं और न किसी से प्रेम, यद्यपि वे ऐसा करते प्रतीत होते हैं।”