हि

अध्याय 5 · 15 / 27

5.16

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥

ज्ञानेन—ज्ञान से; तु—किन्तु; तत्—वह; अज्ञानम्—अविद्या; येषाम्—जिनकी; नाशितम्—नष्ट हो जाती है; आत्मनः—जीव की; तेषाम्—उनका; आदित्यवत्—उदित सूर्य के समान; ज्ञानम्—ज्ञान; प्रकाशयति—प्रकट करता है; तत् परम्—कृष्णभावनामृत में।

किन्तु जब मनुष्य उस ज्ञान से प्रबुद्ध हो जाता है, जिससे अविद्या नष्ट हो जाती है, तब उसका ज्ञान सब कुछ उसी प्रकार प्रकट कर देता है, जिस प्रकार सूर्य दिन में सब कुछ प्रकाशित कर देता है।

जो श्रीकृष्ण को भूल चुके हैं, वे निश्चय ही मोहग्रस्त रहते हैं; किन्तु जो कृष्णभावनामृत में स्थित हैं, वे तनिक भी मोहित नहीं होते। भगवद्गीता में कहा गया है—“सर्वं ज्ञान-प्लवेन”, “ज्ञानाग्निः सर्व-कर्माणि” तथा “न हि ज्ञानेन सदृशम्”। ज्ञान सदा अत्यन्त समादृत है। और वह ज्ञान क्या है? पूर्ण ज्ञान तभी प्राप्त होता है, जब मनुष्य श्रीकृष्ण की शरण में जाता है, जैसा कि सातवें अध्याय के उन्नीसवें श्लोक में कहा गया है—बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। अनेकानेक जन्मों से गुज़रने के पश्चात्, जब ज्ञान में परिपूर्ण मनुष्य श्रीकृष्ण की शरण में आता है, अथवा जब वह कृष्णभावनामृत प्राप्त करता है, तब उसके समक्ष सब कुछ उसी प्रकार प्रकट हो जाता है, जिस प्रकार सूर्य दिन में सब कुछ प्रकाशित कर देता है। जीव अनेक प्रकारों से मोहग्रस्त रहता है। उदाहरणार्थ, जब वह बिना किसी आधार के स्वयं को ईश्वर मान बैठता है, तब वस्तुतः वह अविद्या के अन्तिम जाल में जा गिरता है। यदि जीव ही ईश्वर हो, तो वह अविद्या से मोहित कैसे हो सकता है? क्या ईश्वर अविद्या से मोहित होते हैं? यदि ऐसा हो, तो अविद्या अथवा शैतान ईश्वर से बड़ा हो जाएगा। वास्तविक ज्ञान उसी व्यक्ति से प्राप्त किया जा सकता है, जो पूर्ण कृष्णभावनामृत में स्थित है। अतः मनुष्य को ऐसे प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को खोजना चाहिए और उनके सान्निध्य में यह सीखना चाहिए कि कृष्णभावनामृत क्या है। आध्यात्मिक गुरु समस्त अविद्या को उसी प्रकार दूर कर सकते हैं, जिस प्रकार सूर्य अन्धकार को दूर कर देता है। यद्यपि कोई व्यक्ति इस पूर्ण ज्ञान में स्थित हो सकता है कि वह यह शरीर नहीं, अपितु शरीर से परे दिव्य आत्मा है, तथापि वह आत्मा और परमात्मा में विभेद करने में समर्थ नहीं हो पाता। फिर भी, यदि वह प्रामाणिक, पूर्ण कृष्णभावनाभावित आध्यात्मिक गुरु की शरण लेने की चिन्ता करे, तो वह सब कुछ भली-भाँति जान सकता है। मनुष्य ईश्वर को तथा ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को तभी जान सकता है, जब वह वस्तुतः ईश्वर के प्रतिनिधि से मिलता है। ईश्वर का प्रतिनिधि कभी यह दावा नहीं करता कि वह ईश्वर है, यद्यपि उसे वह समस्त सम्मान दिया जाता है जो सामान्यतः ईश्वर को दिया जाता है, क्योंकि उसे ईश्वर का ज्ञान है। मनुष्य को ईश्वर और जीव के बीच का भेद सीखना होता है। अतः भगवान् श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय (2.12) में कहा कि प्रत्येक जीव व्यष्टि है तथा भगवान् भी व्यष्टि हैं। वे सभी अतीत में व्यष्टि थे, वर्तमान में व्यष्टि हैं, और भविष्य में, मुक्ति के पश्चात् भी, व्यष्टि बने रहेंगे। रात्रि में हम अन्धकार में सब कुछ एक-सा देखते हैं, किन्तु दिन में जब सूर्य उदित होता है, तब हम सब कुछ उसकी वास्तविक पहचान में देखते हैं। आध्यात्मिक जीवन में व्यष्टित्व सहित यह पहचान ही वास्तविक ज्ञान है।