हि

अध्याय 5 · 16 / 27

5.17

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥

तद्-बुद्धयः—जिसकी बुद्धि सदा परम में स्थित रहती है; तद्-आत्मानः—जिसका मन सदा परम में स्थित रहता है; तत्-निष्ठाः—जिसका मन केवल परम के लिए ही है; तत्-परायणाः—जिसने पूर्णतः उनकी शरण ले ली है; गच्छन्ति—जाते हैं; अपुनः-आवृत्तिम्—मुक्ति; ज्ञान—ज्ञान; निर्धूत—धो डालता है; कल्मषाः—शंकाएँ।

जब मनुष्य की बुद्धि, मन, श्रद्धा और आश्रय—ये सब परम में स्थिर हो जाते हैं, तब वह पूर्ण ज्ञान के द्वारा समस्त शंकाओं से भली-भाँति शुद्ध हो जाता है और इस प्रकार मुक्ति के मार्ग पर सीधा अग्रसर होता है।

परम दिव्य सत्य भगवान् श्रीकृष्ण हैं। समूची भगवद्गीता इस घोषणा के चारों ओर केन्द्रित है कि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। समस्त वैदिक साहित्य का यही कथन है। परतत्त्व का अर्थ है वह परम सत्य, जिसे परम के ज्ञाता ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् के रूप में समझते हैं। भगवान्, अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, परम तत्त्व में अन्तिम शब्द हैं। इससे परे कुछ भी नहीं है। भगवान् कहते हैं—मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। निराकार ब्रह्म को भी श्रीकृष्ण ही आधार प्रदान करते हैं—ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्। अतएव सभी प्रकार से श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं। जिसका मन, बुद्धि, श्रद्धा और आश्रय सदा श्रीकृष्ण में स्थित रहते हैं, अथवा दूसरे शब्दों में, जो पूर्णतः कृष्णभावनामृत में स्थित है, वह निःसन्देह समस्त शंकाओं से धुलकर स्वच्छ हो जाता है और दिव्यता से सम्बन्धित प्रत्येक विषय में पूर्ण ज्ञान में स्थित रहता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भली-भाँति समझ सकता है कि श्रीकृष्ण में द्वैत (एक साथ अभिन्नता और व्यष्टित्व) विद्यमान है, और ऐसे दिव्य ज्ञान से सुसज्जित होकर मनुष्य मुक्ति के मार्ग पर स्थिर प्रगति कर सकता है।