अध्याय 5 · 17 / 27
5.18
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥
विद्या—शिक्षा; विनय—विनम्रता; सम्पन्ने—से पूर्णतः युक्त; ब्राह्मणे—ब्राह्मण में; गवि—गौ में; हस्तिनि—हाथी में; शुनि—कुत्ते में; च—तथा; एव—निश्चय ही; श्व-पाके—कुत्ता खाने वाले (चाण्डाल) में; च—क्रमशः; पण्डिताः—जो ऐसे विद्वान् हैं; सम-दर्शिनः—समान दृष्टि से देखते हैं।
विनम्र साधु, सच्चे ज्ञान के बल पर, विद्वान् एवं विनम्र ब्राह्मण, गौ, हाथी, कुत्ते और कुत्ता खाने वाले [चाण्डाल] को समान दृष्टि से देखता है।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जाति अथवा वर्ण में कोई भेद नहीं करता। ब्राह्मण और चाण्डाल सामाजिक दृष्टि से भिन्न हो सकते हैं, अथवा कुत्ता, गौ या हाथी जाति की दृष्टि से भिन्न हो सकते हैं, किन्तु विद्वान् दिव्यवादी की दृष्टि से शरीर के ये भेद निरर्थक हैं। इसका कारण परम के साथ उनका सम्बन्ध है, क्योंकि परमेश्वर अपने पूर्ण अंश परमात्मा के रूप में सबके हृदय में विद्यमान हैं। परम का ऐसा बोध ही वास्तविक ज्ञान है। जहाँ तक भिन्न वर्णों अथवा भिन्न योनियों के शरीरों का प्रश्न है, भगवान् सबके प्रति समान रूप से दयालु हैं, क्योंकि वे प्रत्येक जीव को मित्र मानते हैं और जीवों की परिस्थितियों की परवाह किए बिना स्वयं को परमात्मा के रूप में बनाए रखते हैं। भगवान् परमात्मा के रूप में चाण्डाल में भी विद्यमान हैं और ब्राह्मण में भी, यद्यपि ब्राह्मण का शरीर और चाण्डाल का शरीर एक-समान नहीं हैं। शरीर प्रकृति के भिन्न-भिन्न गुणों की भौतिक उपज हैं, किन्तु शरीर के भीतर स्थित आत्मा और परमात्मा एक ही आध्यात्मिक गुणवाले हैं। तथापि आत्मा और परमात्मा की गुणगत समानता उन्हें परिमाण में समान नहीं बना देती, क्योंकि व्यष्टि आत्मा केवल उसी विशेष शरीर में विद्यमान रहती है, जबकि परमात्मा प्रत्येक शरीर में विद्यमान रहते हैं। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को इसका पूर्ण ज्ञान होता है, अतः वह वस्तुतः विद्वान् है और समान दृष्टिवाला है। आत्मा और परमात्मा के समान लक्षण यह हैं कि वे दोनों चेतन, नित्य और आनन्दमय हैं। किन्तु भेद यह है कि व्यष्टि आत्मा शरीर के सीमित क्षेत्र के भीतर चेतन रहती है, जबकि परमात्मा समस्त शरीरों के प्रति चेतन रहते हैं। परमात्मा बिना किसी भेद के समस्त शरीरों में विद्यमान हैं।