अध्याय 5 · 19 / 27
5.20
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥
न—कभी नहीं; प्रहृष्येत्—हर्षित होता है; प्रियम्—सुखद; प्राप्य—प्राप्त करके; न—नहीं; उद्विजेत्—विचलित होता है; प्राप्य—प्राप्त करके; च—भी; अप्रियम्—अप्रिय; स्थिर-बुद्धिः—स्थिर-बुद्धिवाला; असम्मूढः—मोहरहित; ब्रह्म-वित्—जो परम को पूर्णतः जानता है; ब्रह्मणि—दिव्यता में; स्थितः—स्थित।
जो व्यक्ति न तो कोई सुखद वस्तु प्राप्त करके हर्षित होता है और न ही कोई अप्रिय वस्तु प्राप्त करके शोक करता है, जो स्थिर-बुद्धि एवं मोहरहित है, और जो ईश्वर के विज्ञान को जानता है, उसे पहले से ही दिव्यता में स्थित समझना चाहिए।
आत्म-साक्षात्कारी व्यक्ति के लक्षण यहाँ दिए गए हैं। प्रथम लक्षण यह है कि वह शरीर की अपने सच्चे स्वरूप के साथ की मिथ्या पहचान से भ्रमित नहीं होता। वह भली-भाँति जानता है कि वह यह शरीर नहीं, अपितु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का अंशस्वरूप है। अतः वह न तो कोई वस्तु प्राप्त करके हर्षित होता है, और न ही अपने शरीर से सम्बन्धित किसी वस्तु को खोकर शोक करता है। मन की यह स्थिरता स्थिर-बुद्धि अथवा आत्म-बुद्धि कहलाती है। अतएव वह स्थूल शरीर को आत्मा समझ बैठने के कारण कभी मोहित नहीं होता, और न ही शरीर को नित्य मानकर आत्मा के अस्तित्व की उपेक्षा करता है। यह ज्ञान उसे परम सत्य के सम्पूर्ण विज्ञान—अर्थात् ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—को जानने की अवस्था तक उन्नत कर देता है। इस प्रकार वह सभी प्रकार से परम के साथ एक होने का मिथ्या प्रयास किए बिना, अपनी स्वरूपगत स्थिति को भली-भाँति जान लेता है। यही ब्रह्म-साक्षात्कार अथवा आत्म-साक्षात्कार कहलाता है। ऐसी स्थिर चेतना कृष्णभावनामृत कहलाती है।