हि

अध्याय 5 · 20 / 27

5.21

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥

बाह्य-स्पर्शेषु—बाह्य इन्द्रिय-सुख में; असक्त-आत्मा—जो आसक्त नहीं है; विन्दति—भोगता है; आत्मनि—आत्मा में; यत्—जो; सुखम्—सुख; सः—वह; ब्रह्म-योग—ब्रह्म में एकाग्र; युक्त-आत्मा—आत्मा से संयुक्त; सुखम्—सुख; अक्षयम्—असीम; अश्नुते—भोगता है।

ऐसा मुक्त व्यक्ति भौतिक इन्द्रिय-सुख अथवा बाह्य वस्तुओं की ओर आकृष्ट नहीं होता, अपितु सदा समाधि में रहता हुआ अपने भीतर के सुख का भोग करता है। इस प्रकार आत्म-साक्षात्कारी व्यक्ति असीम सुख का भोग करता है, क्योंकि वह परम पर एकाग्र रहता है।

कृष्णभावनामृत में स्थित महान् भक्त श्री यामुनाचार्य ने कहा है—

yadāvadhi mama cetaḥ kṛṣṇa-padāravinde

nava-nava-rasa-dhāmanudyata rantum āsīt

tadāvadhi bata nārī-saṅgame smaryamāne

bhavati mukha-vikāraḥ suṣṭu niṣṭhīvanaṁ ca

“जब से मैं श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न हुआ हूँ, और उनमें सदा नवीन आनन्द का अनुभव करता हूँ, तब से जब कभी मैं विषय-सुख का स्मरण करता हूँ, तो उस विचार पर थूकता हूँ और मेरे ओष्ठ घृणा से सिकुड़ जाते हैं।” ब्रह्म-योग अथवा कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति भगवान् की प्रेममयी सेवा में इतना तल्लीन रहता है कि वह भौतिक इन्द्रिय-सुख के प्रति अपनी रुचि पूर्णतः खो देता है। पदार्थ की दृष्टि से सर्वोच्च सुख विषय-सुख है। समूचा संसार इसके वशीभूत होकर चल रहा है, और एक भौतिकतावादी इस प्रेरणा के बिना तनिक भी कार्य नहीं कर सकता। किन्तु कृष्णभावनामृत में संलग्न व्यक्ति, जिस विषय-सुख से वह बचता है, उसके बिना ही अधिक उत्साह से कार्य कर सकता है। आध्यात्मिक साक्षात्कार में यही कसौटी है। आध्यात्मिक साक्षात्कार और विषय-सुख एक साथ नहीं रहते। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति मुक्त आत्मा होने के कारण किसी भी प्रकार के इन्द्रिय-सुख की ओर आकृष्ट नहीं होता।