अध्याय 5 · 21 / 27
5.22
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
ये—वे; हि—निश्चय ही; संस्पर्श-जाः—भौतिक इन्द्रियों के सम्पर्क से उत्पन्न; भोगाः—भोग; दुःख—दुःख; योनयः—के स्रोत; एव—निश्चय ही; ते—वे हैं; आदि—आरम्भ में; अन्तवन्तः—के अधीन; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; न—कभी नहीं; तेषु—उनमें; रमते—आनन्द लेता है; बुधः—बुद्धिमान्।
बुद्धिमान् व्यक्ति उन दुःख के स्रोतों में भाग नहीं लेता, जो भौतिक इन्द्रियों के सम्पर्क से उत्पन्न होते हैं। हे कुन्तीपुत्र! ऐसे भोगों का आदि और अन्त होता है, अतः बुद्धिमान् व्यक्ति उनमें आनन्द नहीं लेता।
भौतिक इन्द्रिय-सुख भौतिक इन्द्रियों के सम्पर्क से उत्पन्न होते हैं, जो सभी क्षणिक हैं, क्योंकि शरीर स्वयं ही क्षणिक है। मुक्त आत्मा किसी भी क्षणिक वस्तु में रुचि नहीं रखती। दिव्य सुखों के आनन्द को भली-भाँति जानते हुए, मुक्त आत्मा मिथ्या सुख भोगने को कैसे सहमत हो सकती है? पद्म पुराण में कहा गया है—
ramante yogino ‘nante satyānanda-cid-ātmani
iti rāma-padenāsau paraṁ brahmābhidhīyate
“योगीजन परम सत्य से असीम दिव्य सुख प्राप्त करते हैं, अतएव परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, राम के नाम से भी जाने जाते हैं।”
श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है—
nāyaṁ deho deha-bhājāṁ nṛ-loke
kaṣṭān kāmān arhate viḍ-bhajāṁ ye
tapo divyaṁ putrakā yena sattvaṁ
śuddhyed yasmād brahma-saukhyaṁ tv anantam.
“हे मेरे प्रिय पुत्रो! जीवन के इस मानव रूप में इन्द्रिय-सुख के लिए अत्यन्त कठोर परिश्रम करने का कोई कारण नहीं है; ऐसे सुख तो विष्ठा खाने वालों [शूकरों] को भी सुलभ हैं। इसके स्थान पर, तुम्हें इस जीवन में ऐसी तपस्या करनी चाहिए, जिससे तुम्हारा अस्तित्व शुद्ध हो जाए, और फलस्वरूप तुम असीम दिव्य आनन्द का भोग कर सकोगे।” (भा. 5.5.1)
अतएव जो सच्चे योगी अथवा विद्वान् दिव्यवादी हैं, वे इन्द्रिय-सुखों की ओर आकृष्ट नहीं होते, जो निरन्तर भौतिक अस्तित्व के कारण हैं। मनुष्य जितना अधिक भौतिक सुखों का व्यसनी होता है, उतना ही अधिक वह भौतिक दुःखों में फँस जाता है।