अध्याय 5 · 22 / 27
5.23
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥
शक्नोति—समर्थ है; इह एव—इसी शरीर में; यः—जो; सोढुम्—सहन करने में; प्राक्—पूर्व; शरीर—शरीर; विमोक्षणात्—त्यागने से; काम—इच्छा; क्रोध—क्रोध; उद्भवम्—से उत्पन्न; वेगम्—वेग; सः—वह; युक्तः—समाधि में; सः—वह; सुखी—सुखी; नरः—मनुष्य।
इस वर्तमान शरीर को त्यागने से पूर्व, यदि कोई भौतिक इन्द्रियों के वेगों को सहन करने तथा इच्छा और क्रोध के बल को रोकने में समर्थ है, तो वह योगी है और इस संसार में सुखी है।
यदि कोई आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर स्थिर प्रगति करना चाहता है, तो उसे भौतिक इन्द्रियों के वेगों को नियन्त्रित करने का प्रयत्न करना चाहिए। वाणी के वेग, क्रोध के वेग, मन के वेग, उदर के वेग, जननेन्द्रिय के वेग तथा जिह्वा के वेग होते हैं। जो इन समस्त भिन्न-भिन्न इन्द्रियों के तथा मन के वेगों को नियन्त्रित करने में समर्थ है, वह गोस्वामी अथवा स्वामी कहलाता है। ऐसे गोस्वामीगण कठोरतापूर्वक नियन्त्रित जीवन जीते हैं और इन्द्रियों के वेगों का पूर्णतः परित्याग कर देते हैं। भौतिक इच्छाएँ, जब अतृप्त रहती हैं, तब क्रोध उत्पन्न करती हैं, और इस प्रकार मन, नेत्र तथा वक्ष विचलित हो जाते हैं। अतः मनुष्य को इस भौतिक शरीर को त्यागने से पूर्व उन्हें नियन्त्रित करने का अभ्यास करना चाहिए। जो ऐसा कर सकता है, उसे आत्म-साक्षात्कारी समझा जाता है और इस प्रकार वह आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में सुखी रहता है। इच्छा और क्रोध को नियन्त्रित करने का प्रयत्नपूर्वक प्रयास करना दिव्यवादी का कर्तव्य है।