अध्याय 6 · 2 / 42
6.2
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥
यम्—जिसे; सन्न्यासम्—संन्यास; इति—इस प्रकार; प्राहुः—वे कहते हैं; योगम्—परम के साथ युक्त होना; तम्—उसे; विद्धि—तुम जान लो; पाण्डव—हे पाण्डुपुत्र; न—कभी नहीं; हि—निश्चय ही; असन्न्यस्त—त्याग किए बिना; सङ्कल्पः—आत्म-तृप्ति; योगी—योगी; भवति—बनता है; कश्चन—कोई भी।
हे पाण्डव! जिसे संन्यास कहते हैं, उसे ही तुम योग, अर्थात् अपने को परम से युक्त करना जानो, क्योंकि जब तक मनुष्य इन्द्रियतृप्ति की इच्छा का त्याग नहीं करता, तब तक वह योगी नहीं बन सकता।
वास्तविक संन्यासयोग अथवा भक्ति का अर्थ यह है कि मनुष्य जीव के रूप में अपनी स्वरूपगत स्थिति को जाने और तदनुसार कर्म करे। जीव की कोई पृथक् स्वतन्त्र पहचान नहीं है। वह परम की तटस्था शक्ति है। जब वह भौतिक शक्ति द्वारा फँस जाता है, तब वह बद्ध हो जाता है, और जब वह कृष्णभावनाभावित होता है, अर्थात् आध्यात्मिक शक्ति के प्रति सचेत होता है, तब वह अपनी वास्तविक एवं स्वाभाविक जीवन-दशा में स्थित होता है। अतः जब मनुष्य पूर्ण ज्ञान में स्थित होता है, तब वह समस्त भौतिक इन्द्रियतृप्ति का परित्याग कर देता है, अर्थात् सभी प्रकार की इन्द्रियतृप्तिमूलक क्रियाओं का त्याग कर देता है। इसी का अभ्यास वे योगी करते हैं, जो इन्द्रियों को भौतिक आसक्ति से रोकते हैं। किन्तु कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति के लिए अपनी इन्द्रियों को किसी ऐसे कार्य में लगाने का अवसर ही नहीं रहता, जो श्रीकृष्ण के प्रयोजन हेतु न हो। अतएव कृष्णभावनाभावित व्यक्ति एक साथ ही संन्यासी तथा योगी है। ज्ञान का तथा इन्द्रियों के संयम का जो प्रयोजन ज्ञान एवं योग की प्रक्रियाओं में निर्धारित है, वह कृष्णभावनामृत में स्वतः ही सिद्ध हो जाता है। यदि मनुष्य अपने स्वार्थपूर्ण स्वभाव की क्रियाओं को त्यागने में असमर्थ है, तो ज्ञान और योग व्यर्थ हैं। वास्तविक लक्ष्य यही है कि जीव समस्त स्वार्थपूर्ण तृप्ति का त्याग कर दे और परम को सन्तुष्ट करने के लिए तत्पर रहे। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को किसी भी प्रकार के आत्म-भोग की इच्छा नहीं होती। वह सदा परम के भोग के लिए संलग्न रहता है। जिसे परम का कोई ज्ञान नहीं है, उसे अनिवार्यतः आत्म-तृप्ति में ही प्रवृत्त रहना पड़ता है, क्योंकि कोई भी निष्क्रियता की भूमि पर टिक नहीं सकता। ये समस्त प्रयोजन कृष्णभावनामृत के अभ्यास से भली-भाँति सिद्ध हो जाते हैं।