अध्याय 6 · 10 / 42
6.10
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥
योगी—योगी; युञ्जीत—कृष्णभावनामृत में एकाग्र होना चाहिए; सततम्—निरन्तर; आत्मानम्—स्वयं को (शरीर, मन तथा आत्मा के द्वारा); रहसि—एकान्त स्थान में; स्थितः—इस प्रकार स्थित होकर; एकाकी—अकेला; यत-चित्तात्मा—मन में सदा सावधान; निराशीः—किसी अन्य वस्तु से आकृष्ट हुए बिना; अपरिग्रहः—स्वामित्व की भावना से मुक्त।
योगी को चाहिए कि वह सदा अपने मन को परमात्मा पर एकाग्र करने का प्रयत्न करे; वह किसी एकान्त स्थान में अकेला रहे और सदा सावधानीपूर्वक अपने मन को वश में रखे। उसे इच्छाओं तथा स्वामित्व की भावनाओं से मुक्त होना चाहिए।
श्रीकृष्ण की अनुभूति विभिन्न मात्राओं में ब्रह्म, परमात्मा तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में होती है। कृष्णभावनामृत का संक्षेप में अर्थ यह है कि मनुष्य सदा भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न रहे। किन्तु जो निराकार ब्रह्म अथवा स्थानिक परमात्मा से आसक्त हैं, वे भी आंशिक रूप से कृष्णभावनाभावित हैं, क्योंकि निराकार ब्रह्म श्रीकृष्ण की आध्यात्मिक किरण है और परमात्मा श्रीकृष्ण का सर्वव्यापक आंशिक विस्तार है। इस प्रकार निर्विशेषवादी तथा ध्यानी भी अप्रत्यक्ष रूप से कृष्णभावनाभावित हैं। प्रत्यक्ष रूप से कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सर्वोच्च योगी है, क्योंकि ऐसा भक्त जानता है कि ब्रह्म अथवा परमात्मा से क्या अभिप्राय है। परम सत्य का उसका ज्ञान पूर्ण है, जबकि निर्विशेषवादी तथा ध्यानशील योगी अपूर्ण रूप से कृष्णभावनाभावित हैं।
तथापि इन सभी को यहाँ यह उपदेश दिया गया है कि वे अपने-अपने विशिष्ट अनुसरणों में निरन्तर संलग्न रहें, जिससे वे शीघ्र अथवा विलम्ब से सर्वोच्च पूर्णता को प्राप्त कर सकें। योगी का प्रथम कार्य यह है कि वह मन को सदा श्रीकृष्ण पर लगाए रखे। मनुष्य को सदा श्रीकृष्ण का चिन्तन करना चाहिए और उन्हें एक क्षण के लिए भी न भूलना चाहिए। मन को परम पर एकाग्र करना समाधि अथवा तुरीय अवस्था कहलाता है। मन को एकाग्र करने हेतु मनुष्य को सदा एकान्त में रहना चाहिए और बाह्य पदार्थों से उत्पन्न विक्षोभ से बचना चाहिए। उसे अपनी अनुभूति को प्रभावित करने वाली अनुकूल परिस्थितियों को स्वीकार करने तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को अस्वीकार करने में अत्यन्त सावधान रहना चाहिए। और पूर्ण संकल्प के साथ उसे ऐसी अनावश्यक भौतिक वस्तुओं की लालसा नहीं करनी चाहिए, जो स्वामित्व की भावनाओं से उसे फँसा लें।
ये समस्त पूर्णताएँ तथा सावधानियाँ तब भली-भाँति सम्पन्न होती हैं जब मनुष्य प्रत्यक्ष रूप से कृष्णभावनामृत में स्थित होता है, क्योंकि प्रत्यक्ष कृष्णभावनामृत का अर्थ है आत्म-निषेध, जिसमें भौतिक स्वामित्व की सम्भावना अत्यन्त अल्प रहती है। श्रील रूप गोस्वामी कृष्णभावनामृत का वर्णन इस प्रकार करते हैं :
anāsaktasya viṣayān yathārham upayuñjataḥ
nirbandhaḥ kṛṣṇa-sambandhe yuktaṁ vairāgyam ucyate
prāpañcikatayā buddhyā hari-sambandhi-vastunaḥ
mumukṣubhiḥ parityāgo vairāgyaṁ phalgu kathyate.
(भक्ति-रसामृत-सिन्धु 2.255-256)
“जब मनुष्य किसी वस्तु से आसक्त नहीं होता, किन्तु साथ ही सब कुछ को श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में स्वीकार करता है, तब वह उचित रूप से स्वामित्व के ऊपर स्थित होता है। दूसरी ओर, जो श्रीकृष्ण से उसके सम्बन्ध को जाने बिना सब कुछ अस्वीकार कर देता है, उसका वैराग्य उतना पूर्ण नहीं होता।”
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भली-भाँति जानता है कि सब कुछ श्रीकृष्ण का है, और इस प्रकार वह सदा वैयक्तिक स्वामित्व की भावनाओं से मुक्त रहता है। ऐसी स्थिति में उसे अपने वैयक्तिक हित के लिए किसी वस्तु की लालसा नहीं रहती। वह जानता है कि कृष्णभावनामृत के पक्ष में वस्तुओं को कैसे स्वीकार करना है और कृष्णभावनामृत के प्रतिकूल वस्तुओं को कैसे अस्वीकार करना है। वह सदा भौतिक वस्तुओं से पृथक् रहता है, क्योंकि वह सदा दिव्य है, और वह सदा अकेला रहता है, क्योंकि उन व्यक्तियों से उसका कोई सरोकार नहीं, जो कृष्णभावनामृत में स्थित नहीं हैं। अतएव कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति ही पूर्ण योगी है।