अध्याय 6 · 11 / 42
6.11-12
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रिय ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥
शुचौ—पवित्र; देशे—भूमि में; प्रतिष्ठाप्य—रखकर; स्थिरम्—दृढ़; आसनम्—आसन; आत्मनः—अपना; न—नहीं; अति—अत्यन्त; उच्छ्रितम्—ऊँचा; न—न ही; अति—अत्यन्त; नीचम्—नीचा; चैल-अजिन—मुलायम वस्त्र तथा मृगचर्म; कुशोत्तरम्—कुश घास; तत्र—वहाँ; एकाग्रम्—एकाग्र; मनः—मन; कृत्वा—करके; यत-चित्त—मन को वश में करते हुए; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; क्रियः—क्रियाएँ; उपविश्य—बैठकर; आसने—आसन पर; युञ्ज्यात्—सम्पादन करे; योगम्—योगाभ्यास; आत्म—हृदय; विशुद्धये—शुद्ध करने हेतु।
योग का अभ्यास करने के लिए मनुष्य को किसी एकान्त स्थान में जाना चाहिए और भूमि पर कुश-घास बिछाकर उसे मृगचर्म तथा मुलायम वस्त्र से ढक देना चाहिए। आसन न तो अत्यन्त ऊँचा हो और न ही अत्यन्त नीचा, और वह किसी पवित्र स्थान में स्थित हो। तब योगी को उस पर अत्यन्त दृढ़ता से बैठकर मन तथा इन्द्रियों को वश में करते हुए, हृदय को शुद्ध करते हुए तथा मन को एक बिन्दु पर स्थिर करते हुए योग का अभ्यास करना चाहिए।
“पवित्र स्थान” का तात्पर्य तीर्थस्थानों से है। भारत में योगी, साधक अथवा भक्तगण सभी घर त्यागकर प्रयाग, मथुरा, वृन्दावन, हृषीकेश तथा हरिद्वार जैसे पवित्र स्थानों में निवास करते हैं और एकान्त में वहाँ योग का अभ्यास करते हैं, जहाँ यमुना तथा गंगा जैसी पवित्र नदियाँ प्रवाहित होती हैं। किन्तु प्रायः यह सम्भव नहीं हो पाता, विशेषकर पाश्चात्य लोगों के लिए। बड़े नगरों के तथाकथित योग-समाज भौतिक लाभ अर्जित करने में सफल हो सकते हैं, किन्तु वे योग के वास्तविक अभ्यास के लिए तनिक भी उपयुक्त नहीं हैं। जो आत्मसंयमी नहीं है और जिसका मन अविचलित नहीं है, वह ध्यान का अभ्यास नहीं कर सकता। अतएव बृहन्नारदीय पुराण में कहा गया है कि कलियुग में (वर्तमान युग अथवा काल में), जब सामान्य जन अल्पायु होते हैं, आध्यात्मिक अनुभूति में मन्द होते हैं और सदा विविध चिन्ताओं से विचलित रहते हैं, तब आध्यात्मिक अनुभूति का सर्वोत्तम साधन भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन है।
harer nāma harer nāma harer nāmaiva kevalam
kalau nāsty eva nāsty eva nāsty eva gatir anyathā.
“इस कलह तथा पाखण्ड के युग में मुक्ति का एकमात्र साधन भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन है। कोई दूसरा मार्ग नहीं है। कोई दूसरा मार्ग नहीं है। कोई दूसरा मार्ग नहीं है।”