हि

अध्याय 6 · 9 / 42

6.9

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९ ॥

सुहृत्—स्वभाव से शुभचिन्तक; मित्र—स्नेहपूर्ण हितैषी; अरि—शत्रु; उदासीन—विवादियों के बीच तटस्थ; मध्यस्थ—विवादियों के बीच मध्यस्थ; द्वेष्य—द्वेषी; बन्धुषु—सम्बन्धियों अथवा शुभचिन्तकों में; साधुषु—पुण्यात्माओं के प्रति; अपि—साथ ही; च—तथा; पापेषु—पापियों के प्रति; सम-बुद्धिः—समान बुद्धि रखने वाला; विशिष्यते—अत्यधिक उन्नत है।

जब मनुष्य सबको—सच्चे शुभचिन्तक, मित्रों तथा शत्रुओं, द्वेषियों, पुण्यात्माओं, पापियों तथा उन सबको, जो उदासीन एवं निष्पक्ष हैं—समान दृष्टि से देखता है, तब उसे और भी अधिक उन्नत कहा जाता है।