अध्याय 6 · 12 / 42
6.13-14
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥
समम्—सीधा; काय-शिरः—शरीर तथा सिर; ग्रीवम्—गर्दन; धारयन्—धारण करते हुए; अचलम्—अचल; स्थिरः—स्थिर; सम्प्रेक्ष्य—देखते हुए; नासिका—नाक; अग्रम्—अग्रभाग; स्वम्—अपनी; दिशः—समस्त दिशाएँ; च—भी; अनवलोकयन्—न देखते हुए; प्रशान्त—अनुद्विग्न; आत्मा—मन; विगत-भीः—भय से रहित; ब्रह्मचारि-व्रते—ब्रह्मचर्य के व्रत में; स्थितः—स्थित; मनः—मन; संयम्य—पूर्णतः संयत करके; मत्—मुझ (श्रीकृष्ण) पर; चित्तः—एकाग्र; युक्तः—वास्तविक योगी; आसीत—स्थित होकर; मत्—मेरा; परः—परम लक्ष्य।
मनुष्य को अपने शरीर, गर्दन तथा सिर को सीधी रेखा में सीधा धारण करना चाहिए और दृढ़ता से नाक के अग्रभाग पर दृष्टि टिकानी चाहिए। इस प्रकार अनुद्विग्न तथा संयत मन से, भय से रहित होकर, यौन-जीवन से पूर्णतया मुक्त रहकर, मनुष्य को हृदय के भीतर मेरा ध्यान करना चाहिए और मुझे ही जीवन का परम लक्ष्य बनाना चाहिए।
जीवन का लक्ष्य श्रीकृष्ण को जानना है, जो परमात्मा के रूप में, चतुर्भुज विष्णु-रूप में, प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं। योग की प्रक्रिया का अभ्यास विष्णु के इसी स्थानिक रूप को ढूँढने तथा देखने के लिए किया जाता है, किसी अन्य प्रयोजन से नहीं। स्थानिक विष्णु-मूर्ति मनुष्य के हृदय में निवास करने वाले श्रीकृष्ण का पूर्ण प्रतिनिधित्व है। जिसके पास इस विष्णु-मूर्ति का साक्षात्कार करने की कोई योजना नहीं है, वह व्यर्थ ही छद्म-योगाभ्यास में संलग्न रहता है और निश्चय ही अपना समय नष्ट करता है। श्रीकृष्ण जीवन के परम लक्ष्य हैं, और मनुष्य के हृदय में स्थित विष्णु-मूर्ति योगाभ्यास का लक्ष्य है। हृदय के भीतर इस विष्णु-मूर्ति का साक्षात्कार करने हेतु मनुष्य को यौन-जीवन से पूर्ण विरति का पालन करना होता है; अतः उसे घर त्यागकर किसी एकान्त स्थान में अकेला रहना पड़ता है और उपर्युक्त रीति से बैठा रहना पड़ता है। मनुष्य घर पर अथवा अन्यत्र प्रतिदिन यौन-जीवन का भोग करते हुए और किसी तथाकथित योग-कक्षा में जाकर योगी नहीं बन सकता। उसे मन को वश में करने का तथा सभी प्रकार की इन्द्रियतृप्ति से बचने का अभ्यास करना होता है, जिनमें यौन-जीवन प्रमुख है। महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा रचित ब्रह्मचर्य के नियमों में कहा गया है :
karmaṇā manasā vācā sarvāvasthāsu sarvadā
sarvatra maithuṇa-tyāgo brahmacaryaṁ pracakṣate.
“ब्रह्मचर्य का व्रत मनुष्य को कर्म, वचन तथा मन से—सर्वदा, समस्त अवस्थाओं में तथा समस्त स्थानों में—यौन-भोग से पूर्णतया विरत रहने में सहायता करने हेतु है।” कोई भी यौन-भोग के द्वारा शुद्ध योगाभ्यास नहीं कर सकता। अतएव ब्रह्मचर्य की शिक्षा बाल्यकाल से ही दी जाती है, जब मनुष्य को यौन-जीवन का कोई ज्ञान नहीं होता। पाँच वर्ष की आयु में बालकों को गुरुकुल, अर्थात् आध्यात्मिक गुरु के स्थान पर भेज दिया जाता है, और गुरु उन बालकों को ब्रह्मचारी बनने के कठोर अनुशासन में प्रशिक्षित करते हैं। ऐसे अभ्यास के बिना कोई भी किसी भी योग में—चाहे वह ध्यान हो, ज्ञान हो अथवा भक्ति हो—उन्नति नहीं कर सकता। तथापि जो विवाहित जीवन के नियमों तथा विधि-विधानों का पालन करता है और केवल अपनी पत्नी के साथ (वह भी नियम के अधीन) यौन-सम्बन्ध रखता है, वह भी ब्रह्मचारी कहलाता है। ऐसा संयमी गृहस्थ ब्रह्मचारी भक्ति-सम्प्रदाय में स्वीकार किया जा सकता है, किन्तु ज्ञान तथा ध्यान के सम्प्रदाय गृहस्थ ब्रह्मचारियों को भी स्वीकार नहीं करते। वे बिना किसी समझौते के पूर्ण विरति की अपेक्षा करते हैं। भक्ति-सम्प्रदाय में गृहस्थ ब्रह्मचारी को संयमित यौन-जीवन की अनुमति है, क्योंकि भक्तियोग का सम्प्रदाय इतना शक्तिशाली है कि भगवान् की उच्चतर सेवा में संलग्न रहने के कारण मनुष्य स्वतः ही यौन-आकर्षण खो देता है। भगवद्गीता में कहा गया है :
viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ
rasa-varjaṁ raso ‘py asya paraṁ dṛṣṭvā nivartate
जहाँ अन्यों को इन्द्रियतृप्ति से स्वयं को रोकना पड़ता है, वहीं भगवान् का भक्त उच्चतर रस के कारण स्वतः ही विरत हो जाता है। भक्त के अतिरिक्त किसी अन्य को उस उच्चतर रस का कोई ज्ञान नहीं होता।
विगतभीः। जब तक मनुष्य पूर्णतया कृष्णभावनामृत में स्थित नहीं होता, तब तक वह निर्भय नहीं हो सकता। बद्ध आत्मा अपनी विकृत स्मृति के कारण, अर्थात् श्रीकृष्ण के साथ अपने नित्य सम्बन्ध की विस्मृति के कारण भयग्रस्त रहती है। भागवत कहता है, भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्याद् ईशाद् अपेतस्य विपर्ययो’स्मृतिः : कृष्णभावनामृत ही निर्भयता का एकमात्र आधार है। अतएव जो व्यक्ति कृष्णभावनाभावित है, उसके लिए ही पूर्ण अभ्यास सम्भव है। और चूँकि योगाभ्यास का परम लक्ष्य भगवान् को अपने भीतर देखना है, अतः कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पहले से ही समस्त योगियों में श्रेष्ठ है। यहाँ उल्लिखित योग पद्धति के सिद्धान्त लोकप्रिय तथाकथित योग-समाजों के सिद्धान्तों से भिन्न हैं।