अध्याय 6 · 13 / 42
6.15
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥
युञ्जन्—इस प्रकार अभ्यास करते हुए; एवम्—जैसा ऊपर कहा गया; सदा—निरन्तर; आत्मानम्—शरीर, मन तथा आत्मा; योगी—योगी; नियत-मानसः—संयमित मन वाला; शान्तिम्—शान्ति; निर्वाण-परमाम्—भौतिक अस्तित्व की समाप्ति; मत्-संस्थाम्—आध्यात्मिक आकाश में (भगवद्धाम में); अधिगच्छति—प्राप्त करता है।
इस प्रकार शरीर, मन तथा क्रियाओं के संयम का अभ्यास करते हुए योगी भौतिक अस्तित्व की समाप्ति द्वारा भगवद्धाम [अथवा श्रीकृष्ण के धाम] को प्राप्त करता है।
अब योगाभ्यास का परम लक्ष्य स्पष्ट रूप से समझाया गया है। योगाभ्यास किसी भी प्रकार की भौतिक सुविधा प्राप्त करने के लिए नहीं है; यह तो समस्त भौतिक अस्तित्व की समाप्ति को सम्भव बनाने के लिए है। जो स्वास्थ्य में सुधार चाहता है अथवा भौतिक पूर्णता की कामना करता है, वह भगवद्गीता के अनुसार योगी नहीं है। न ही भौतिक अस्तित्व की समाप्ति का अर्थ “शून्य” में प्रवेश करना है, जो केवल एक मिथ्या कल्पना है। भगवान् की सृष्टि में कहीं भी कोई शून्य नहीं है। अपितु भौतिक अस्तित्व की समाप्ति मनुष्य को आध्यात्मिक आकाश में, अर्थात् भगवद्धाम में प्रवेश करने में समर्थ बनाती है। भगवद्धाम का भगवद्गीता में भी स्पष्ट रूप से उस स्थान के रूप में वर्णन किया गया है, जहाँ न सूर्य की, न चन्द्रमा की, न ही विद्युत् की आवश्यकता है। आध्यात्मिक राज्य के समस्त लोक भौतिक आकाश में सूर्य के समान स्वयं-प्रकाशित हैं। भगवद्धाम सर्वत्र है, किन्तु आध्यात्मिक आकाश तथा उसके लोक परं धाम, अर्थात् उच्चतर धाम कहलाते हैं।
जो परिपक्व योगी भगवान् श्रीकृष्ण को समझने में पूर्ण है—जैसा कि यहाँ भगवान् ने स्वयं स्पष्ट रूप से कहा है (मत्-चित्तः, मत्-परः, मत्-स्थानम्)—वह वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकता है और अन्ततः उनके परम धाम, अर्थात् गोलोक वृन्दावन नामक कृष्णलोक को प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मसंहिता में स्पष्ट रूप से कहा गया है (गोलोक एव निवसत्यखिलात्म-भूतः) कि भगवान्, यद्यपि सदा अपने गोलोक नामक धाम में निवास करते हैं, अपनी उच्चतर आध्यात्मिक शक्तियों के बल पर सर्वव्यापक ब्रह्म तथा स्थानिक परमात्मा भी हैं। श्रीकृष्ण तथा उनके पूर्ण विस्तार विष्णु के समुचित ज्ञान के बिना कोई भी आध्यात्मिक आकाश में नहीं पहुँच सकता अथवा भगवान् के नित्य धाम (वैकुण्ठ गोलोक वृन्दावन) में प्रवेश नहीं कर सकता। अतएव कृष्णभावनामृत में कर्म करने वाला व्यक्ति ही पूर्ण योगी है, क्योंकि उसका मन सदा श्रीकृष्ण की लीलाओं में तल्लीन रहता है। स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोः। वेदों में भी हम सीखते हैं : तम् एव विदित्वातिमृत्युम् एति : “केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को समझकर ही मनुष्य जन्म-मृत्यु के मार्ग को पार कर सकता है।” दूसरे शब्दों में, योग पद्धति की पूर्णता भौतिक अस्तित्व से मुक्ति की प्राप्ति है, न कि निर्दोष लोगों को मूर्ख बनाने हेतु कोई जादुई बाज़ीगरी अथवा शारीरिक कलाबाज़ी।