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अध्याय 6 · 14 / 42

6.16

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥

न—कभी नहीं; अति—बहुत अधिक; अश्नतः—इस प्रकार खाने वाले का; तु—किन्तु; योगः—परमेश्वर से संयोग; अस्ति—होता है; न—न ही; च—भी; एकान्तम्—अत्यन्त कम; अनश्नतः—भोजन से विरत रहने वाले का; न—न ही; च—भी; अति—बहुत अधिक; स्वप्न-शीलस्य—बहुत अधिक सोने वाले का; जाग्रतः—अथवा बहुत अधिक रात्रि-जागरण करने वाले का; न—नहीं; एव—कभी; च—और; अर्जुन—हे अर्जुन।

हे अर्जुन! जो बहुत अधिक खाता है अथवा बहुत कम खाता है, बहुत अधिक सोता है अथवा पर्याप्त नहीं सोता, उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है।

यहाँ योगियों के लिए आहार और निद्रा के नियमन की अनुशंसा की गई है। बहुत अधिक खाने का अर्थ है शरीर और आत्मा को एक साथ बनाए रखने के लिए जितना आवश्यक है, उससे अधिक खाना। मनुष्यों के लिए पशुओं को खाने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अन्न, शाक, फल और दुग्ध की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है। भगवद्गीता के अनुसार ऐसा सरल आहार सत्त्वगुण में माना जाता है। पशु-आहार उनके लिए है जो तमोगुण में हैं। अतः जो लोग पशु-आहार, मद्यपान, धूम्रपान तथा ऐसा भोजन करने में लिप्त रहते हैं, जो पहले श्रीकृष्ण को अर्पित नहीं किया गया, वे केवल दूषित वस्तुओं को खाने के कारण पापमय प्रतिक्रियाओं को भोगते हैं। भुञ्जते ते त्व् अघं पापा ये पचन्त्य् आत्म-कारणात्। जो कोई इन्द्रियतृप्ति के लिए खाता है, अथवा अपने लिए पकाता है और अपना भोजन श्रीकृष्ण को अर्पित नहीं करता, वह केवल पाप खाता है। जो पाप खाता है और अपने निर्धारित अंश से अधिक खाता है, वह पूर्ण योग का निष्पादन नहीं कर सकता। सर्वोत्तम तो यही है कि मनुष्य केवल श्रीकृष्ण को अर्पित भोजन का अवशेष ही खाए। कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति ऐसी कोई वस्तु नहीं खाता जो पहले श्रीकृष्ण को अर्पित न की गई हो। अतएव केवल कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ही योग-साधना में पूर्णता प्राप्त कर सकता है। न ही वह व्यक्ति योग का अभ्यास कर सकता है जो उपवास की अपनी कोई व्यक्तिगत विधि गढ़कर कृत्रिम रूप से भोजन से विरत रहता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति उपवास उसी प्रकार रखता है, जिस प्रकार शास्त्रों में उसकी अनुशंसा की गई है। वह न तो उपवास करता है, न आवश्यकता से अधिक खाता है, और इस प्रकार वह योग-साधना करने में सक्षम होता है। जो आवश्यकता से अधिक खाता है, वह सोते समय बहुत स्वप्न देखेगा, और फलस्वरूप उसे आवश्यकता से अधिक सोना पड़ेगा। मनुष्य को प्रतिदिन छह घण्टे से अधिक नहीं सोना चाहिए। जो चौबीस घण्टों में से छह घण्टे से अधिक सोता है, वह निश्चय ही तमोगुण से प्रभावित होता है। तमोगुण में स्थित व्यक्ति आलसी होता है और बहुत अधिक सोने की प्रवृत्ति रखता है। ऐसा व्यक्ति योग नहीं कर सकता।