अध्याय 6 · 15 / 42
6.17
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥
युक्त—नियमित; आहार—भोजन; विहारस्य—मनोरंजन; युक्त—नियमित; चेष्टस्य—जीविका के लिए कर्म करने वाले का; कर्मसु—कर्तव्यों के निर्वाह में; युक्त—नियमित; स्वप्न-अवबोधस्य—नियमित निद्रा और जागरण; योगः—योगाभ्यास; भवति—हो जाता है; दुःख-हा—दुःखों को कम करने वाला।
जो खाने, सोने, कर्म करने और मनोरंजन की अपनी आदतों में संयमित है, वह योग-पद्धति के अभ्यास द्वारा समस्त भौतिक दुःखों को शान्त कर सकता है।
खाने, सोने, रक्षा करने और मैथुन में अति — जो शरीर की माँगें हैं — योगाभ्यास में उन्नति को अवरुद्ध कर सकती है। जहाँ तक भोजन का प्रश्न है, इसका नियमन केवल तभी हो सकता है जब मनुष्य प्रसादम् अर्थात् पवित्रीकृत भोजन ग्रहण करने और स्वीकार करने का अभ्यासी हो जाए। भगवद्गीता (गीता 9.26) के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण को शाक, पुष्प, फल, अन्न, दुग्ध आदि अर्पित किए जाते हैं। इस प्रकार कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति स्वतः ही ऐसा भोजन न स्वीकार करने का अभ्यस्त हो जाता है, जो मनुष्य के उपभोग के लिए नहीं है अथवा जो सत्त्वगुण की कोटि में नहीं आता। जहाँ तक निद्रा का प्रश्न है, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कृष्णभावनामृत में अपने कर्तव्यों के निर्वाह में सदैव सतर्क रहता है, और अतएव सोने में व्यतीत किया गया कोई भी अनावश्यक समय महान् हानि माना जाता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भगवान् की सेवा में संलग्न हुए बिना अपने जीवन का एक क्षण भी व्यतीत नहीं कर सकता। इसलिए उसकी निद्रा न्यूनतम रहती है। इस सम्बन्ध में उसके आदर्श श्रील रूप गोस्वामी हैं, जो सदैव श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न रहते थे और जो दिन में दो घण्टे से अधिक नहीं सो पाते थे, और कभी-कभी तो उतना भी नहीं। ठाकुर हरिदास तीन लाख नामों के जप की अपनी दैनिक माला पूरी किए बिना न तो प्रसादम् स्वीकार करते थे और न ही एक क्षण के लिए सोते थे। जहाँ तक कर्म का प्रश्न है, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ऐसा कुछ नहीं करता जो श्रीकृष्ण के हित से सम्बद्ध न हो, और इस प्रकार उसका कर्म सदैव नियमित रहता है और इन्द्रियतृप्ति से अदूषित रहता है। चूँकि इन्द्रियतृप्ति का कोई प्रश्न ही नहीं है, अतः कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति के लिए कोई भौतिक अवकाश नहीं होता। और चूँकि वह अपने समस्त कर्म, वाणी, निद्रा, जागरण तथा अन्य सभी शारीरिक क्रियाओं में नियमित रहता है, इसलिए उसके लिए कोई भौतिक दुःख नहीं होता।