अध्याय 6 · 17 / 42
6.19
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥
यथा—जैसे; दीपः—दीपक; निवातस्थः—वायुरहित स्थान में; न—नहीं; इङ्गते—डोलता; सा उपमा—उससे तुलना की गई; स्मृता—उपमित; योगिनः—योगी की; यत-चित्तस्य—जिसका मन वश में है; युञ्जतः—निरन्तर संलग्न; योगम्—ध्यान में; आत्मनः—दिव्य पर।
जिस प्रकार वायुरहित स्थान में दीपक नहीं डोलता, उसी प्रकार वह दिव्यवादी, जिसका मन वश में है, दिव्य आत्मा पर अपने ध्यान में सदैव स्थिर रहता है।
सच्चा कृष्णभावनाभावित व्यक्ति, जो सदैव दिव्य में निमग्न रहता है और अपने आराध्य भगवान् के निरन्तर अविचल ध्यान में लीन रहता है, वायुरहित स्थान में रखे दीपक के समान स्थिर रहता है।