हि

अध्याय 6 · 18 / 42

6.20-23

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २० ॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२ ॥
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ॥ २३ ॥

यत्र—उस स्थिति में; उपरमते—जब मनुष्य दिव्य आनन्द का अनुभव करता है; चित्तम्—मानसिक क्रियाएँ; निरुद्धम्—भौतिक वस्तु से निरुद्ध; योग-सेवया—योग के अनुष्ठान द्वारा; यत्र—जिसमें; च—भी; एव—निश्चय ही; आत्मना—शुद्ध मन द्वारा; आत्मानम्—आत्मा को; पश्यन्—स्थिति का साक्षात्कार करते हुए; आत्मनि—आत्मा में; तुष्यति—सन्तुष्ट हो जाता है; सुखम्—सुख; आत्यन्तिकम्—परम; यत्—जिसमें; तत्—वह; बुद्धि—बुद्धि; ग्राह्यम्—ग्राह्य; अतीन्द्रियम्—दिव्य; वेत्ति—जानता है; यत्र—जिसमें; न—कभी नहीं; च—भी; एव—निश्चय ही; अयम्—इसमें; स्थितः—स्थित; चलति—विचलित होता है; तत्त्वतः—सत्य से; यम्—जिसे; लब्ध्वा—प्राप्ति द्वारा; च—भी; अपरम्—कोई अन्य; लाभम्—लाभ; मन्यते—नहीं मानता; न—कभी नहीं; अधिकम्—उससे अधिक; ततः—उससे; यस्मिन्—जिसमें; स्थितः—स्थित होकर; न—कभी नहीं; दुःखेन—दुःखों से; गुरुणापि—यद्यपि अत्यन्त कठिन; विचाल्यते—विचलित होता है; तम्—उसे; विद्यात्—तुम्हें जानना चाहिए; दुःख-संयोग—भौतिक संसर्ग के दुःख; वियोगम्—विनाश; योग-संज्ञितम्—योग में समाधि।

पूर्णता की अवस्था को समाधि अथवा त्राण कहा जाता है, जब योगाभ्यास द्वारा मनुष्य का मन भौतिक मानसिक क्रियाओं से पूर्णतः निरुद्ध हो जाता है। इसका लक्षण मनुष्य की वह क्षमता है जिससे वह शुद्ध मन द्वारा आत्मा को देख सकता है तथा आत्मा में आस्वादन और आनन्द ले सकता है। उस आनन्दमय अवस्था में मनुष्य असीम दिव्य सुख में स्थित होता है और दिव्य इन्द्रियों के माध्यम से आनन्द भोगता है। इस प्रकार स्थित होकर मनुष्य कभी सत्य से विचलित नहीं होता, और इसे प्राप्त करके वह मानता है कि इससे बड़ा कोई लाभ नहीं है। ऐसी स्थिति में स्थित होकर मनुष्य महानतम कठिनाई के मध्य भी कभी विचलित नहीं होता। यह वस्तुतः भौतिक संसर्ग से उत्पन्न समस्त दुःखों से वास्तविक मुक्ति है।

योगाभ्यास द्वारा मनुष्य भौतिक धारणाओं से क्रमशः विरक्त हो जाता है। यह योग-सिद्धान्त का प्रमुख लक्षण है। और इसके पश्चात् मनुष्य समाधि अथवा त्राण में स्थित हो जाता है, जिसका अर्थ है कि योगी दिव्य मन और बुद्धि के माध्यम से परमात्मा का साक्षात्कार करता है, और आत्मा को परमात्मा से अभिन्न मानने की किसी भी भ्रान्ति के बिना। योगाभ्यास प्रायः पतञ्जलि-पद्धति के सिद्धान्तों पर आधारित है। कुछ अप्रामाणिक भाष्यकार जीवात्मा को परमात्मा से अभिन्न सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, और अद्वैतवादी इसी को मुक्ति मानते हैं, किन्तु वे पतञ्जलि की योग-पद्धति के वास्तविक प्रयोजन को नहीं समझते। पतञ्जलि-पद्धति में दिव्य आनन्द की स्वीकृति है, किन्तु अद्वैतवादी एकत्व के सिद्धान्त के विघटन के भय से इस दिव्य आनन्द को स्वीकार नहीं करते। ज्ञान और ज्ञाता की द्वैतता को अद्वैतवादी स्वीकार नहीं करता, किन्तु इस श्लोक में दिव्य आनन्द को — जो दिव्य इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव किया जाता है — स्वीकार किया गया है। और इसकी पुष्टि योग-पद्धति के सुप्रसिद्ध प्रवक्ता पतञ्जलि मुनि द्वारा होती है। वे महान् ऋषि अपने योग-सूत्रों में घोषणा करते हैं: पुरुषार्थ-शून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूप-प्रतिष्ठा वा चिति-शक्तिर् इति।

यह चिति-शक्ति अथवा अन्तरंगा शक्ति दिव्य है। पुरुषार्थ का अर्थ है भौतिक धार्मिकता, आर्थिक विकास, इन्द्रियतृप्ति और अन्ततः परमेश्वर से एक होने का प्रयास। इस “परमेश्वर से एकत्व” को अद्वैतवादी कैवल्य कहता है। किन्तु पतञ्जलि के अनुसार यह कैवल्य एक अन्तरंगा अथवा दिव्य शक्ति है, जिसके द्वारा जीव अपनी स्वाभाविक स्थिति के प्रति सचेत हो जाता है। भगवान् चैतन्य के शब्दों में इस स्थिति को चेतो-दर्पण-मार्जनम् अर्थात् मन के मलिन दर्पण का परिमार्जन कहा जाता है। यह “परिमार्जन” वस्तुतः मुक्ति अथवा भव-महादावाग्नि-निर्वापणम् है। निर्वाण का सिद्धान्त — जो प्रारम्भिक भी है — इसी सिद्धान्त से मेल खाता है। श्रीमद्भागवत में इसे स्वरूपेण व्यवस्थितिः कहा जाता है। भगवद्गीता भी इस श्लोक में इस स्थिति की पुष्टि करती है।

निर्वाण अथवा भौतिक उपरति के पश्चात् आध्यात्मिक क्रियाओं अथवा भगवान् की भक्ति का प्राकट्य होता है, जिसे कृष्णभावनामृत कहा जाता है। श्रीमद्भागवत के शब्दों में, स्वरूपेण व्यवस्थितिः: यही “जीव का वास्तविक जीवन” है। माया अथवा भ्रम भौतिक संक्रमण से दूषित आध्यात्मिक जीवन की अवस्था है। इस भौतिक संक्रमण से मुक्ति का अर्थ जीव की मूल नित्य स्थिति का विनाश नहीं है। पतञ्जलि भी अपने शब्दों कैवल्यं स्वरूप-प्रतिष्ठा वा चिति-शक्तिर् इति द्वारा इसे स्वीकार करते हैं। यह चिति-शक्ति अथवा दिव्य आनन्द ही वास्तविक जीवन है। इसकी पुष्टि वेदान्त-सूत्रों में आनन्दमयो ऽभ्यासात् के रूप में होती है। यह स्वाभाविक दिव्य आनन्द योग का परम लक्ष्य है और भक्ति अथवा भक्तियोग के निष्पादन द्वारा सरलता से प्राप्त किया जाता है। भक्तियोग का सजीव वर्णन भगवद्गीता के सप्तम अध्याय में किया जाएगा।

जैसा कि इस अध्याय में वर्णित है, योग-पद्धति में दो प्रकार की समाधि होती है, जिन्हें सम्प्रज्ञात-समाधि और असम्प्रज्ञात-समाधि कहा जाता है। जब मनुष्य विविध दार्शनिक अनुसन्धानों द्वारा दिव्य स्थिति में स्थित हो जाता है, तो इसे सम्प्रज्ञात-समाधि कहा जाता है। असम्प्रज्ञात-समाधि में सांसारिक सुख से अब कोई सम्बन्ध नहीं रहता, क्योंकि तब मनुष्य इन्द्रियों से प्राप्त समस्त प्रकार के सुखों से परे, दिव्य हो जाता है। योगी एक बार उस दिव्य स्थिति में स्थित हो जाने पर उससे कभी विचलित नहीं होता। जब तक योगी इस स्थिति तक नहीं पहुँच पाता, तब तक वह असफल रहता है। आज की तथाकथित योग-साधना, जिसमें विविध इन्द्रिय-सुख सम्मिलित हैं, विरोधाभासी है। काम और मादक द्रव्यों में लिप्त योगी एक उपहास है। यहाँ तक कि वे योगी भी, जो योग-प्रक्रिया में सिद्धियों से आकृष्ट हो जाते हैं, पूर्ण रूप से स्थित नहीं होते। यदि योगी योग के उपोत्पादों से आकृष्ट हो जाएँ, तो वे पूर्णता की अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकते, जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है। अतः जो व्यक्ति व्यायाम-कौशल अथवा सिद्धियों के दिखावटी अभ्यास में लिप्त रहते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि उस मार्ग में योग का लक्ष्य खो जाता है।

इस युग में योग की सर्वोत्तम साधना कृष्णभावनामृत है, जो विभ्रमकारी नहीं है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने कार्य में इतना सुखी रहता है कि वह किसी अन्य सुख की आकांक्षा नहीं करता। इस कपट के युग में विशेष रूप से हठयोग, ध्यानयोग और ज्ञानयोग का अभ्यास करने में अनेक बाधाएँ हैं, किन्तु कर्मयोग अथवा भक्तियोग के निष्पादन में ऐसी कोई समस्या नहीं है।

जब तक भौतिक शरीर विद्यमान रहता है, तब तक मनुष्य को शरीर की माँगों — अर्थात् खाने, सोने, रक्षा करने और मैथुन — को पूरा करना पड़ता है। किन्तु जो व्यक्ति शुद्ध भक्तियोग अथवा कृष्णभावनामृत में स्थित है, वह शरीर की माँगों को पूरा करते समय इन्द्रियों को उद्दीप्त नहीं करता। प्रत्युत वह जीवन की केवल अत्यावश्यक वस्तुओं को स्वीकार करता है, बुरे सौदे का सर्वोत्तम उपयोग करता है, और कृष्णभावनामृत में दिव्य सुख का भोग करता है। वह आकस्मिक घटनाओं — जैसे दुर्घटनाएँ, रोग, अभाव और यहाँ तक कि किसी अत्यन्त प्रिय सम्बन्धी की मृत्यु — के प्रति उदासीन रहता है, किन्तु वह कृष्णभावनामृत अथवा भक्तियोग में अपने कर्तव्यों के निष्पादन हेतु सदैव सतर्क रहता है। दुर्घटनाएँ उसे कभी उसके कर्तव्य से विचलित नहीं करतीं। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, आगमापायिनो ऽनित्यास् तांस् तितिक्षस्व भारत। वह ऐसी समस्त आकस्मिक घटनाओं को सहन करता है, क्योंकि वह जानता है कि वे आती-जाती रहती हैं और उसके कर्तव्यों को प्रभावित नहीं करतीं। इस प्रकार वह योग-साधना में सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त करता है।