अध्याय 6 · 3 / 42
6.3
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्यतस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥
आरुरुक्षोः—जिसने अभी-अभी योग आरम्भ किया है, उसका; मुनेः—मुनि का; योगम्—अष्टांगयोग पद्धति; कर्म—कर्म; कारणम्—कारण; उच्यते—कहा जाता है; योग—अष्टांगयोग; आरूढस्य—जिसने प्राप्त कर लिया है, उसका; तस्य—उसका; एव—निश्चय ही; शमः—समस्त भौतिक क्रियाओं की समाप्ति; कारणम्—कारण; उच्यते—कहा जाता है।
अष्टांगयोग पद्धति में जो नवदीक्षित है, उसके लिए कर्म साधन कहा जाता है; और जिसने योग को पहले से ही प्राप्त कर लिया है, उसके लिए समस्त भौतिक क्रियाओं की समाप्ति साधन कही जाती है।
अपने को परम से युक्त करने की प्रक्रिया योग कहलाती है, जिसकी तुलना सर्वोच्च आध्यात्मिक साक्षात्कार प्राप्त करने हेतु एक सीढ़ी से की जा सकती है। यह सीढ़ी जीव की निम्नतम भौतिक दशा से आरम्भ होकर शुद्ध आध्यात्मिक जीवन में पूर्ण आत्म-साक्षात्कार तक ऊपर चढ़ती है। विभिन्न उन्नति-स्तरों के अनुसार इस सीढ़ी के भिन्न-भिन्न भाग भिन्न-भिन्न नामों से जाने जाते हैं। किन्तु समग्र रूप में यह सम्पूर्ण सीढ़ी योग कहलाती है, और इसे तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है, अर्थात् ज्ञानयोग, ध्यानयोग तथा भक्तियोग। सीढ़ी का आरम्भ योगारुरुक्षु अवस्था कहलाता है, और सर्वोच्च सोपान योगारूढ कहलाता है।
अष्टांगयोग पद्धति के विषय में, जीवन के नियामक सिद्धान्तों तथा विभिन्न आसनों के अभ्यास (जो प्रायः शारीरिक व्यायाम ही हैं) के माध्यम से ध्यान में प्रवेश करने के आरम्भिक प्रयत्न सकाम भौतिक क्रियाएँ माने जाते हैं। ऐसी समस्त क्रियाएँ इन्द्रियों को वश में करने हेतु पूर्ण मानसिक सन्तुलन की प्राप्ति की ओर ले जाती हैं। जब मनुष्य ध्यान के अभ्यास में निपुण हो जाता है, तब वह समस्त विक्षोभकारी मानसिक क्रियाओं को विराम दे देता है।
किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति आरम्भ से ही ध्यान की भूमि पर स्थित रहता है, क्योंकि वह सदैव श्रीकृष्ण का चिन्तन करता है। और निरन्तर श्रीकृष्ण की सेवा में संलग्न रहने के कारण, उसने समस्त भौतिक क्रियाओं को विराम दे दिया है, ऐसा माना जाता है।