अध्याय 6 · 19 / 42
6.24
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥
सः—वह योग-पद्धति; निश्चयेन—दृढ़ संकल्प के साथ; योक्तव्यः—अभ्यास की जानी चाहिए; योगः—ऐसे अभ्यास में; अनिर्विण्ण-चेतसा—विचलित हुए बिना; संकल्प—भौतिक इच्छाएँ; प्रभवान्—से उत्पन्न; कामान्—इन्द्रियतृप्ति; त्यक्त्वा—त्यागकर; सर्वान्—समस्त; अशेषतः—पूर्णतः; मनसा—मन द्वारा; एव—निश्चय ही; इन्द्रिय-ग्रामम्—समस्त इन्द्रियों को; विनियम्य—नियमित करते हुए; समन्ततः—चारों ओर से।
मनुष्य को अविचल संकल्प और श्रद्धा के साथ योग के अभ्यास में संलग्न होना चाहिए। उसे मिथ्या अहंकार से उत्पन्न समस्त भौतिक इच्छाओं को बिना किसी अपवाद के त्याग देना चाहिए और इस प्रकार मन द्वारा चारों ओर से समस्त इन्द्रियों को वश में करना चाहिए।
योग-साधक को संकल्पवान् होना चाहिए और धैर्यपूर्वक बिना विचलित हुए अभ्यास का निष्पादन करना चाहिए। मनुष्य को अन्त में सफलता के प्रति आश्वस्त रहना चाहिए और इस मार्ग का महान् दृढ़ता के साथ अनुसरण करना चाहिए, तथा सफलता की प्राप्ति में किसी विलम्ब के होने पर हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। दृढ़ साधक के लिए सफलता निश्चित है। भक्तियोग के विषय में रूप गोस्वामी कहते हैं:
utsāhān niścayād dhairyāt tat tat karma-pravartanāt
saṅga-tyāgāt satovṛtteḥ ṣaḍbhir bhaktiḥ prasidhyati
“भक्तियोग की प्रक्रिया को भक्तों की संगति में विहित कर्तव्यों का अनुसरण करके और सत्त्वगुण की क्रियाओं में पूर्ण रूप से संलग्न होकर, पूर्ण हृदय के उत्साह, दृढ़ता और संकल्प के साथ सफलतापूर्वक निष्पादित किया जा सकता है।”
संकल्प के विषय में मनुष्य को उस चिड़िया का उदाहरण लेना चाहिए, जिसने अपने अण्डे समुद्र की लहरों में खो दिए थे। एक चिड़िया ने समुद्र के तट पर अपने अण्डे दिए, किन्तु विशाल समुद्र अपनी लहरों पर उन अण्डों को बहा ले गया। चिड़िया अत्यन्त व्याकुल हो गई और उसने समुद्र से अपने अण्डे लौटाने को कहा। समुद्र ने उसकी प्रार्थना पर विचार तक नहीं किया। अतः चिड़िया ने समुद्र को सुखा देने का निश्चय किया। वह अपनी छोटी-सी चोंच से जल निकालने लगी, और उसके असम्भव संकल्प पर सब उस पर हँसे। उसकी इस क्रिया का समाचार फैल गया, और अन्ततः भगवान् विष्णु के विशालकाय पक्षीवाहन गरुड ने उसे सुना। उन्हें अपनी छोटी बहन पक्षी पर करुणा आई, और इसलिए वे चिड़िया को देखने आए। गरुड उस छोटी चिड़िया के संकल्प से अत्यन्त प्रसन्न हुए, और उन्होंने सहायता का वचन दिया। इस प्रकार गरुड ने तुरन्त समुद्र से अण्डे लौटाने को कहा, अन्यथा वे स्वयं चिड़िया का कार्य अपने हाथ में ले लेंगे। इससे समुद्र भयभीत हो गया और उसने अण्डे लौटा दिए। इस प्रकार गरुड की कृपा से चिड़िया सुखी हो गई।
इसी प्रकार योग की साधना, विशेषतः कृष्णभावनामृत में भक्तियोग, एक अत्यन्त कठिन कार्य प्रतीत हो सकती है। किन्तु यदि कोई महान् संकल्प के साथ इन सिद्धान्तों का अनुसरण करता है, तो भगवान् निश्चय ही सहायता करते हैं, क्योंकि जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं, ईश्वर उनकी सहायता करते हैं।