अध्याय 6 · 21 / 42
6.26
यतो यतो निश्चलति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥
यतः—जिससे भी; यतः—जहाँ भी; निश्चलति—वस्तुतः विचलित होता है; मनः—मन; चञ्चलम्—चपल; अस्थिरम्—अस्थिर; ततः—वहाँ से; ततः—और उसके पश्चात्; नियम्य—नियमित करते हुए; एतत्—इसे; आत्मनि—आत्मा में; एव—निश्चय ही; वशम्—वश में; नयेत्—लाना चाहिए।
मन अपनी चपल और अस्थिर प्रकृति के कारण जिस किसी वस्तु से और जहाँ कहीं भी भटके, मनुष्य को निश्चय ही उसे वहाँ से हटाकर पुनः आत्मा के वश में लाना चाहिए।
मन की प्रकृति चपल और अस्थिर है। किन्तु आत्म-साक्षात्कारी योगी को मन को वश में करना होता है; मन को उसे वश में नहीं करना चाहिए। जो मन को (और अतएव इन्द्रियों को भी) वश में करता है, उसे गोस्वामी अथवा स्वामी कहा जाता है, और जो मन के वश में होता है, उसे गोदास अथवा इन्द्रियों का दास कहा जाता है। गोस्वामी इन्द्रिय-सुख के मानदण्ड को जानता है। दिव्य इन्द्रिय-सुख में इन्द्रियाँ हृषीकेश अथवा इन्द्रियों के परम स्वामी — श्रीकृष्ण — की सेवा में संलग्न रहती हैं। शुद्ध इन्द्रियों से श्रीकृष्ण की सेवा करना कृष्णभावनामृत कहलाता है। यही इन्द्रियों को पूर्ण वश में लाने का उपाय है। और तो और, यही योग-साधना की सर्वोच्च पूर्णता है।