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अध्याय 6 · 29 / 42

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चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥

चञ्चलम्—चञ्चल; हि—निश्चय ही; मनः—मन; कृष्ण—हे श्रीकृष्ण; प्रमाथि—विक्षुब्ध करने वाला; बलवत्—प्रबल; दृढम्—हठी; तस्य—उसका; अहम्—मैं; निग्रहम्—वश में करना; मन्ये—सोचता हूँ; वायोः—वायु का; इव—समान; सुदुष्करम्—कठिन।

हे श्रीकृष्ण! क्योंकि मन चञ्चल, उद्दण्ड, हठी तथा अत्यन्त प्रबल है, इसलिए मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि उसे वश में करना वायु को नियन्त्रित करने से भी अधिक कठिन है।

मन इतना प्रबल तथा हठी है कि यद्यपि वह बुद्धि के अधीन माना जाता है, तथापि कभी-कभी वह बुद्धि पर भी विजय पा लेता है। व्यावहारिक जगत् में रहने वाले मनुष्य के लिए, जिसे अनेक विरोधी तत्त्वों से संघर्ष करना पड़ता है, मन को वश में करना निश्चय ही अत्यन्त कठिन है। कृत्रिम रूप से कोई व्यक्ति मित्र तथा शत्रु दोनों के प्रति मानसिक समता स्थापित कर सकता है, किन्तु अन्ततः कोई भी सांसारिक मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि यह प्रचण्ड वायु को नियन्त्रित करने से भी अधिक कठिन है। वैदिक साहित्य में कहा गया है :

ātmānaṁ rathinaṁ viddhi śarīraṁ ratham eva ca

buddhintu sārathiṁ viddhi manaḥ pragraham eva ca

indriyāṇi hayānāhur viṣayāṁs teṣu gocarān

ātmendriya-mano-yukto bhoktety āhur manīṣiṇaḥ.

“जीव भौतिक शरीररूपी रथ में यात्री है, और बुद्धि सारथि है। मन लगाम है, और इन्द्रियाँ घोड़े हैं। इस प्रकार आत्मा मन तथा इन्द्रियों के संग में भोक्ता अथवा भोग करने वाला बनता है। महान् विचारक ऐसा ही समझते हैं।” बुद्धि से मन का निर्देशन होना चाहिए, किन्तु मन इतना प्रबल तथा हठी है कि वह प्रायः अपनी ही बुद्धि पर भी विजय पा लेता है। ऐसे प्रबल मन को योग के अभ्यास से वश में किया जाना चाहिए, किन्तु ऐसा अभ्यास अर्जुन जैसे सांसारिक व्यक्ति के लिए कभी व्यावहारिक नहीं है। फिर आधुनिक मनुष्य की तो बात ही क्या? यहाँ प्रयुक्त उपमा उपयुक्त है : चलती हुई वायु को कोई पकड़ नहीं सकता। और उद्दण्ड मन को पकड़ना तो उससे भी अधिक कठिन है। मन को वश में करने का सबसे सरल उपाय, जैसा कि भगवान् चैतन्य ने सुझाया है, पूर्ण विनयपूर्वक “हरे कृष्ण” का—उद्धार के महामन्त्र का—जप करना है। निर्धारित विधि है स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोः : मनुष्य को अपना मन पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण में संलग्न करना चाहिए। तभी मन को विचलित करने वाली कोई अन्य प्रवृत्ति शेष नहीं रहेगी।