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अध्याय 6 · 30 / 42

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श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥

श्रीभगवान् उवाच—भगवान् ने कहा; असंशयम्—निःसन्देह; महा-बाहो—हे महाबाहु; मनः—मन; दुर्निग्रहम्—वश में करना कठिन; चलम्—चञ्चल; अभ्यासेन—अभ्यास द्वारा; तु—किन्तु; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; वैराग्येण—वैराग्य द्वारा; च—भी; गृह्यते—वश में किया जा सकता है।

श्रीभगवान् ने कहा : हे महाबाहु कुन्तीपुत्र! निःसन्देह चञ्चल मन को वश में करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु निरन्तर अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा यह सम्भव है।

हठी मन को वश में करने की कठिनाई को, जैसा अर्जुन ने व्यक्त किया, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्वीकार करते हैं। किन्तु साथ ही वे यह भी सुझाते हैं कि अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा यह सम्भव है। वह अभ्यास क्या है? वर्तमान युग में कोई भी कठोर नियमों तथा विधि-विधानों का पालन नहीं कर सकता, जैसे स्वयं को किसी पवित्र स्थान में स्थापित करना, मन को परमात्मा पर केन्द्रित करना, इन्द्रियों तथा मन का संयम करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, एकान्त में रहना आदि। तथापि कृष्णभावनामृत के अभ्यास से मनुष्य भगवान् की नौ प्रकार की भक्ति में संलग्न होता है। ऐसी भक्ति-प्रवृत्तियों में सर्वप्रथम तथा सर्वप्रमुख श्रीकृष्ण के विषय में श्रवण करना है। मन से समस्त सन्देहों को दूर करने की यह एक अत्यन्त शक्तिशाली दिव्य विधि है। मनुष्य जितना अधिक श्रीकृष्ण के विषय में श्रवण करता है, उतना ही अधिक वह प्रबुद्ध होता है तथा प्रत्येक उस वस्तु से अनासक्त होता है, जो मन को श्रीकृष्ण से दूर खींचती है। मन को उन कार्यों से अनासक्त करके, जो भगवान् को समर्पित नहीं हैं, मनुष्य अत्यन्त सरलता से वैराग्य सीख सकता है। वैराग्य का अर्थ है पदार्थ से अनासक्ति तथा मन को आत्मा में संलग्न करना। निर्विशेष आध्यात्मिक वैराग्य, मन को श्रीकृष्ण के कार्यकलापों में संलग्न करने की अपेक्षा अधिक कठिन है। यह व्यावहारिक है, क्योंकि श्रीकृष्ण के विषय में श्रवण करने से मनुष्य स्वतः ही परमात्मा के प्रति आसक्त हो जाता है। इस आसक्ति को परेशानुभूति अर्थात् आध्यात्मिक सन्तोष कहा जाता है। यह ठीक उस सन्तोष की अनुभूति के समान है, जो भूखे मनुष्य को खाए गए अन्न के प्रत्येक ग्रास से होती है। इसी प्रकार, भक्ति के निर्वाह से मनुष्य दिव्य सन्तोष का अनुभव करता है, ज्यों-ज्यों मन भौतिक लक्ष्यों से अनासक्त होता जाता है। यह कुछ-कुछ रोग को कुशल उपचार तथा उपयुक्त आहार से दूर करने के समान है। अतः भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य कार्यकलापों का श्रवण उन्मत्त मन के लिए कुशल उपचार है, और श्रीकृष्ण को अर्पित आहार ग्रहण करना पीड़ित रोगी के लिए उपयुक्त पथ्य है। यही उपचार कृष्णभावनामृत की विधि है।