अध्याय 6 · 31 / 42
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असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥
असंयत—अनियन्त्रित; आत्मना—मन से; योगः—आत्म-साक्षात्कार; दुष्प्रापः—प्राप्त करना कठिन; इति—इस प्रकार; मे—मेरा; मतिः—मत; वश्य—नियन्त्रित; आत्मना—मन से; तु—किन्तु; यतता—प्रयत्न करते हुए; शक्यः—व्यावहारिक; अवाप्तुम्—प्राप्त करना; उपायतः—उपयुक्त उपायों द्वारा।
जिसका मन अनियन्त्रित है, उसके लिए आत्म-साक्षात्कार कठिन कार्य है। किन्तु जिसका मन नियन्त्रित है तथा जो उचित उपायों से प्रयत्न करता है, उसकी सफलता निश्चित है। यही मेरा मत है।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् घोषणा करते हैं कि जो मनुष्य मन को भौतिक प्रवृत्ति से अनासक्त करने का उचित उपचार स्वीकार नहीं करता, वह आत्म-साक्षात्कार में सफलता शायद ही प्राप्त कर सकता है। मन को भौतिक भोग में संलग्न रखते हुए योग का अभ्यास करने का प्रयत्न करना, अग्नि पर जल डालते हुए उसे प्रज्वलित करने के समान है। इसी प्रकार, मानसिक नियन्त्रण के बिना योग का अभ्यास समय का अपव्यय है। योग-अभ्यास का ऐसा प्रदर्शन भौतिक दृष्टि से लाभकारी हो सकता है, किन्तु जहाँ तक आध्यात्मिक अनुभूति का प्रश्न है, वह व्यर्थ है। अतः मन को भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में निरन्तर संलग्न करके नियन्त्रित करना चाहिए। जब तक कोई मनुष्य कृष्णभावनामृत में संलग्न न हो, वह मन को सुदृढ़ रूप से नियन्त्रित नहीं कर सकता। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति बिना किसी पृथक् प्रयास के योग-अभ्यास का फल सरलता से प्राप्त कर लेता है, किन्तु योग का अभ्यासी कृष्णभावनाभावित बने बिना सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।