अध्याय 6 · 32 / 42
6.37
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; अयतिः—असफल योगी; श्रद्धया—श्रद्धा सहित; उपेतः—संलग्न; योगात्—योग से; चलित—विचलित; मानसः—ऐसे मन वाला; अप्राप्य—न पाकर; योग-संसिद्धिम्—योग में सर्वोच्च सिद्धि; काम्—कौन-सा; गतिम्—गन्तव्य; कृष्ण—हे श्रीकृष्ण; गच्छति—प्राप्त करता है।
अर्जुन ने कहा : हे श्रीकृष्ण! उस श्रद्धालु मनुष्य का क्या गन्तव्य होता है, जो परिश्रम नहीं करता, जो आरम्भ में आत्म-साक्षात्कार की विधि को ग्रहण करता है, किन्तु बाद में सांसारिक वृत्ति के कारण उससे विमुख हो जाता है और इस प्रकार योग में सिद्धि प्राप्त नहीं करता?
आत्म-साक्षात्कार अथवा योग का मार्ग भगवद्गीता में वर्णित है। आत्म-साक्षात्कार का मूल सिद्धान्त यह ज्ञान है कि जीव यह भौतिक शरीर नहीं है, अपितु वह इससे भिन्न है, और उसका सुख नित्य जीवन, आनन्द तथा ज्ञान में निहित है। ये दिव्य हैं, शरीर तथा मन दोनों से परे हैं। आत्म-साक्षात्कार ज्ञान के मार्ग, अष्टांग-प्रणाली के अभ्यास अथवा भक्तियोग द्वारा खोजा जाता है। इनमें से प्रत्येक विधि में मनुष्य को जीव की स्वरूप-स्थिति, भगवान् के साथ उसके सम्बन्ध तथा उन कार्यों का साक्षात्कार करना होता है, जिनके द्वारा वह खोए हुए सम्बन्ध को पुनः स्थापित कर सकता है और कृष्णभावनामृत की सर्वोच्च सिद्धावस्था प्राप्त कर सकता है। उपर्युक्त तीनों विधियों में से किसी का भी अनुसरण करते हुए, मनुष्य अवश्य ही शीघ्र या विलम्ब से परम लक्ष्य तक पहुँचता है। भगवान् ने इसका कथन द्वितीय अध्याय में किया था : दिव्य मार्ग पर थोड़ा-सा भी प्रयत्न उद्धार की महान् आशा प्रदान करता है। इन तीनों विधियों में से भक्तियोग का मार्ग इस युग के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है, क्योंकि यह ईश्वर-साक्षात्कार की सर्वाधिक प्रत्यक्ष विधि है। दुहरी आश्वस्ति के लिए, अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से अपने पूर्व कथन की पुष्टि करने का अनुरोध कर रहे हैं। मनुष्य निष्ठापूर्वक आत्म-साक्षात्कार का मार्ग ग्रहण कर सकता है, किन्तु ज्ञान के अनुशीलन की प्रक्रिया तथा अष्टांग योग-प्रणाली का अभ्यास इस युग के लिए सामान्यतः अत्यन्त कठिन है। अतः निरन्तर प्रयत्न के बावजूद, मनुष्य अनेक कारणों से असफल हो सकता है। सर्वप्रथम, सम्भव है कि वह विधि का अनुसरण न कर रहा हो। दिव्य मार्ग का अनुसरण करना कमोबेश मोहिनी शक्ति के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करना है। फलतः, जब भी कोई व्यक्ति मोहिनी शक्ति के चंगुल से निकलने का प्रयास करता है, वह उसे विविध प्रलोभनों से पराजित करने का प्रयत्न करती है। बद्धजीव पहले से ही भौतिक शक्ति के गुणों द्वारा प्रलोभित है, और दिव्य अनुशासनों का पालन करते समय भी पुनः प्रलोभित होने की पूरी सम्भावना रहती है। इसे योगात् चलित-मानसः कहते हैं : दिव्य मार्ग से विचलन। अर्जुन आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से विचलन के परिणामों को जानने के लिए जिज्ञासु हैं।