अध्याय 6 · 34 / 42
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एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥
एतत्—यह है; मे—मेरा; संशयम्—सन्देह; कृष्ण—हे श्रीकृष्ण; छेत्तुम्—दूर करने हेतु; अर्हसि—करने का अनुरोध; अशेषतः—पूर्णतः; त्वत्—आप; अन्यः—के अतिरिक्त; संशयस्य—सन्देह का; अस्य—इस; छेत्ता—दूर करने वाला; न—कभी नहीं; हि—निश्चय ही; उपपद्यते—पाया जाना।
हे श्रीकृष्ण! यह मेरा सन्देह है, और मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप इसे पूर्णतः दूर करें। आपके अतिरिक्त ऐसा कोई नहीं मिलता, जो इस सन्देह का नाश कर सके।
श्रीकृष्ण भूत, वर्तमान तथा भविष्य के पूर्ण ज्ञाता हैं। भगवद्गीता के आरम्भ में भगवान् ने कहा था कि समस्त जीव भूतकाल में पृथक्-पृथक् रूप से विद्यमान थे, वे अब वर्तमान में विद्यमान हैं, और वे भविष्य में भी, भौतिक बन्धन से मुक्ति के पश्चात् भी, अपनी पृथक् पहचान बनाए रखते हैं। अतः उन्होंने व्यक्तिगत जीव के भविष्य के प्रश्न को पहले ही स्पष्ट कर दिया है। अब अर्जुन असफल योगी के भविष्य के विषय में जानना चाहते हैं। श्रीकृष्ण के समान अथवा उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है, और निश्चय ही वे तथाकथित महान् ऋषि तथा दार्शनिक, जो भौतिक प्रकृति की दया पर निर्भर हैं, उनकी समानता नहीं कर सकते। अतः श्रीकृष्ण का निर्णय समस्त सन्देहों का अन्तिम तथा पूर्ण उत्तर है, क्योंकि वे भूत, वर्तमान तथा भविष्य को पूर्ण रूप से जानते हैं—किन्तु उन्हें कोई नहीं जानता। श्रीकृष्ण तथा कृष्णभावनाभावित भक्त ही जान सकते हैं कि वास्तविकता क्या है।