अध्याय 6 · 35 / 42
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श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥
श्रीभगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; पार्थ—हे पृथापुत्र; न एव—ऐसा कभी नहीं है; इह—इस भौतिक जगत् में; न—कभी नहीं; अमुत्र—अगले जीवन में; विनाशः—विनाश; तस्य—उसका; विद्यते—विद्यमान है; न—कभी नहीं; हि—निश्चय ही; कल्याण-कृत्—जो शुभ कार्यों में संलग्न है; कश्चित्—कोई भी; दुर्गतिम्—अधोगति; तात—तत्पश्चात्; गच्छति—जाना।
श्रीभगवान् ने कहा : हे पृथापुत्र! शुभ कार्यों में संलग्न योगी का न तो इस लोक में विनाश होता है और न आध्यात्मिक जगत् में; हे मित्र! जो भलाई करता है, वह कभी बुराई से पराजित नहीं होता।
श्रीमद्भागवत (1.5.17) में श्री नारद मुनि व्यासदेव को इस प्रकार उपदेश देते हैं :
tyaktvā sva-dharmaṁ caraṇāmbujaṁ harer
bhajann apakko ‘tha patet tato yadi
yatra kva vābhadram abhūd amuṣya kiṁ
ko vārtha āpto ‘bhajatāṁ sva-dharmataḥ
“यदि कोई समस्त भौतिक संभावनाओं को त्यागकर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूर्ण शरण ग्रहण करता है, तो किसी भी प्रकार की कोई हानि या अधोगति नहीं होती। दूसरी ओर, अभक्त भले ही अपने वृत्तिपरक कर्तव्यों में पूर्ण रूप से संलग्न रहे, फिर भी कुछ प्राप्त नहीं करता।” भौतिक संभावनाओं के लिए अनेक कार्यकलाप हैं, जो शास्त्रीय तथा प्रथागत दोनों हैं। योगी से अपेक्षा की जाती है कि वह जीवन में आध्यात्मिक उन्नति अर्थात् कृष्णभावनामृत के निमित्त समस्त भौतिक कार्यकलापों का त्याग कर दे। कोई यह तर्क कर सकता है कि कृष्णभावनामृत द्वारा मनुष्य सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर सकता है यदि वह पूर्ण हो, किन्तु यदि वह ऐसी सिद्धावस्था प्राप्त नहीं करता, तो वह भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों रूप से हानि उठाता है। शास्त्रों में विधान है कि मनुष्य को विहित कर्तव्यों के पालन न करने की प्रतिक्रिया भोगनी पड़ती है; अतः जो दिव्य कार्यकलापों का उचित रूप से निर्वाह करने में असफल रहता है, वह इन प्रतिक्रियाओं के अधीन हो जाता है। भागवत असफल योगी को आश्वस्त करता है कि उसे किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। यद्यपि वह विहित कर्तव्यों का पूर्ण रूप से पालन न करने की प्रतिक्रिया के अधीन हो सकता है, तथापि वह तब भी हानि में नहीं रहता, क्योंकि शुभ कृष्णभावनामृत कभी विस्मृत नहीं होता, और जो इसमें संलग्न रहा है, वह अगले जीवन में निम्नकुल में जन्म लेने पर भी ऐसा ही बना रहेगा। दूसरी ओर, जो केवल विहित कर्तव्यों का कठोरता से पालन करता है, यदि उसमें कृष्णभावनामृत का अभाव है, तो आवश्यक नहीं कि वह शुभ फल प्राप्त करे।
तात्पर्य को इस प्रकार समझा जा सकता है : मानवता को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, अर्थात् नियमित तथा अनियमित। जो लोग अपने अगले जीवन अथवा आध्यात्मिक मोक्ष के ज्ञान के बिना केवल पाशविक इन्द्रियतृप्ति में संलग्न हैं, वे अनियमित वर्ग के हैं। और जो शास्त्रों में वर्णित विहित कर्तव्यों के सिद्धान्तों का अनुसरण करते हैं, वे नियमित वर्ग में वर्गीकृत किए जाते हैं। अनियमित वर्ग के लोग, चाहे सभ्य हों या असभ्य, शिक्षित हों या अशिक्षित, बलवान हों या दुर्बल, पाशविक प्रवृत्तियों से भरे हुए हैं। उनके कार्यकलाप कभी शुभ नहीं होते, क्योंकि खाने, सोने, रक्षा करने तथा मैथुन की पाशविक प्रवृत्तियों का भोग करते हुए, वे निरन्तर भौतिक अस्तित्व में बने रहते हैं, जो सदा दुःखमय है। दूसरी ओर, जो शास्त्रीय विधानों द्वारा नियमित हैं और इस प्रकार क्रमशः कृष्णभावनामृत तक ऊपर उठते हैं, वे निश्चय ही जीवन में उन्नति करते हैं।
जो लोग तब शुभ के मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं, उन्हें तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, अर्थात् 1) शास्त्रीय नियमों तथा विधि-विधानों के अनुयायी, जो भौतिक समृद्धि का भोग कर रहे हैं, 2) वे जो भौतिक अस्तित्व से परम मुक्ति खोजने का प्रयास कर रहे हैं, और 3) वे जो कृष्णभावनामृत में भक्त हैं। जो भौतिक सुख के लिए शास्त्रों के नियमों तथा विधि-विधानों का अनुसरण कर रहे हैं, उन्हें पुनः दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है : वे जो सकाम कर्मी हैं, और वे जो इन्द्रियतृप्ति हेतु किसी फल की कामना नहीं करते। जो इन्द्रियतृप्ति के लिए सकाम फलों के पीछे हैं, उन्हें जीवन के उच्चतर स्तर तक—यहाँ तक कि उच्चतर लोकों तक—उन्नत किया जा सकता है; किन्तु फिर भी, चूँकि वे भौतिक अस्तित्व से मुक्त नहीं हैं, अतः वे वास्तव में शुभ मार्ग का अनुसरण नहीं कर रहे हैं। केवल वही कार्यकलाप शुभ हैं, जो मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जाते हैं। ऐसा कोई भी कार्य, जो अन्ततः आत्म-साक्षात्कार अथवा जीवन की भौतिक देहात्म-बुद्धि से मुक्ति की ओर लक्षित नहीं है, तनिक भी शुभ नहीं है। कृष्णभावनामृत में किया गया कार्य ही एकमात्र शुभ कार्य है, और जो कोई कृष्णभावनामृत के मार्ग पर उन्नति करने के निमित्त समस्त शारीरिक कष्टों को स्वेच्छा से स्वीकार करता है, उसे कठोर तपस्या में स्थित पूर्ण योगी कहा जा सकता है। और चूँकि अष्टांग योग-प्रणाली कृष्णभावनामृत के परम साक्षात्कार की ओर निर्दिष्ट है, अतः ऐसा अभ्यास भी शुभ है, और जो इस विषय में अपना भरसक प्रयास कर रहा है, उसे अधोगति से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।