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अध्याय 6 · 36 / 42

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प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥

प्राप्य—प्राप्त करके; पुण्य-कृताम्—जिन्होंने पुण्य कर्म किए उनके; लोकान्—लोक; उषित्वा—निवास करके; शाश्वतीः—अनेक; समाः—वर्ष; शुचीनाम्—पवित्र पुरुषों के; श्रीमताम्—समृद्ध पुरुषों के; गेहे—घर में; योग-भ्रष्टः—जो आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से पतित है; अभिजायते—जन्म लेता है।

असफल योगी, पुण्यात्मा जीवों के लोकों में अनेकानेक वर्षों के भोग के पश्चात्, धर्मपरायण लोगों के परिवार में अथवा सम्पन्न कुलीन परिवार में जन्म लेता है।

असफल योगियों को दो वर्गों में विभाजित किया गया है : एक वह, जो अत्यल्प उन्नति के पश्चात् पतित हुआ, और दूसरा वह, जो योग के दीर्घ अभ्यास के पश्चात् पतित हुआ। जो योगी अल्प काल के अभ्यास के पश्चात् पतित होता है, वह उन उच्चतर लोकों में जाता है, जहाँ पुण्यात्मा जीवों को प्रवेश की अनुमति है। वहाँ दीर्घ जीवन के पश्चात्, उसे पुनः इस लोक में भेजा जाता है, ताकि वह किसी धर्मपरायण ब्राह्मण वैष्णव अथवा कुलीन व्यापारियों के परिवार में जन्म ले।

योग-अभ्यास का वास्तविक प्रयोजन कृष्णभावनामृत की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करना है। किन्तु जो इस सीमा तक परिश्रम नहीं करते और भौतिक प्रलोभनों के कारण असफल हो जाते हैं, उन्हें भगवान् की कृपा से अपनी भौतिक प्रवृत्तियों का पूर्ण उपयोग करने की अनुमति दी जाती है। और तत्पश्चात्, उन्हें धर्मपरायण अथवा कुलीन परिवारों में समृद्ध जीवन व्यतीत करने के अवसर दिए जाते हैं। जो ऐसे परिवारों में जन्म लेते हैं, वे इन सुविधाओं का लाभ उठाकर स्वयं को पूर्ण कृष्णभावनामृत तक उन्नत करने का प्रयास कर सकते हैं।