अध्याय 6 · 37 / 42
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अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥
अथवा—अथवा; योगिनाम्—विद्वान योगियों के; एव—निश्चय ही; कुले—कुल में; भवति—जन्म लेता है; धीमताम्—जो महान प्रज्ञा से सम्पन्न हैं उनके; एतत्—यह; हि—निश्चय ही; दुर्लभतरम्—अत्यन्त दुर्लभ; लोके—इस संसार में; जन्म—जन्म; यत्—जो; ईदृशम्—इस प्रकार का।
अथवा वह योगियों के ऐसे कुल में जन्म लेता है, जो निश्चय ही महान प्रज्ञा से सम्पन्न होते हैं। वस्तुतः इस संसार में ऐसा जन्म दुर्लभ है।
योगियों अथवा योगियों के—जो महान प्रज्ञा से युक्त हैं—कुल में जन्म लेने की यहाँ प्रशंसा की गई है, क्योंकि ऐसे कुल में जन्मा बालक जीवन के आरम्भ से ही आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करता है। विशेषतः आचार्य अथवा गोस्वामी कुलों में ऐसा ही होता है। ऐसे कुल परम्परा तथा प्रशिक्षण से अत्यन्त विद्वान तथा भक्त होते हैं, और इस प्रकार वे आध्यात्मिक गुरु बनते हैं। भारत में ऐसे अनेक आचार्य-कुल हैं, किन्तु अब वे अपर्याप्त शिक्षा तथा प्रशिक्षण के कारण पतित हो गए हैं। भगवान् की कृपा से, अब भी ऐसे कुल हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी योगियों का पोषण करते हैं। ऐसे कुलों में जन्म लेना निश्चय ही अत्यन्त सौभाग्य की बात है। सौभाग्यवश, हमारे आध्यात्मिक गुरु ॐ विष्णुपाद श्री श्रीमद् भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज तथा हम दोनों को ही भगवान् की कृपा से ऐसे कुलों में जन्म लेने का अवसर मिला, और हम दोनों को ही जीवन के आरम्भ से ही भगवान् की भक्ति में प्रशिक्षित किया गया। बाद में हम दिव्य व्यवस्था के आदेश से मिले।