अध्याय 6 · 38 / 42
6.43
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥
तत्र—तत्पश्चात्; तम्—उस; बुद्धि-संयोगम्—ऐसी चेतना का पुनरुद्धार; लभते—पुनः प्राप्त करता है; पौर्व—पूर्व; देहिकम्—देह-चेतना; यतते—प्रयत्न करता है; च—भी; ततः—तत्पश्चात्; भूयः—पुनः; संसिद्धौ—सिद्धि हेतु; कुरु-नन्दन—हे कुरुपुत्र।
हे कुरुपुत्र! ऐसा जन्म प्राप्त करने पर, वह अपने पूर्व जीवन की दिव्य चेतना को पुनः जाग्रत करता है, और पूर्ण सफलता प्राप्त करने के निमित्त वह और अधिक उन्नति करने का प्रयास करता है।
राजा भरत, जिन्होंने अपना तृतीय जन्म एक श्रेष्ठ ब्राह्मण के कुल में लिया, पूर्व दिव्य चेतना के पुनरुद्धार हेतु श्रेष्ठ जन्म के उदाहरण हैं। राजा भरत संसार के सम्राट थे, और उनके समय से यह लोक देवताओं के मध्य भारतवर्ष के नाम से प्रसिद्ध है। पहले यह इलावर्तवर्ष के नाम से जाना जाता था। सम्राट ने अल्पायु में ही आध्यात्मिक सिद्धि के लिए संन्यास ले लिया, किन्तु सफलता प्राप्त करने में असफल रहे। अपने अगले जीवन में उन्होंने एक श्रेष्ठ ब्राह्मण के कुल में जन्म लिया और जड़भरत के नाम से प्रसिद्ध हुए, क्योंकि वे सदा एकान्त में रहते थे और किसी से बात नहीं करते थे। और बाद में, राजा रहूगण ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ योगी के रूप में पहचाना। उनके जीवन से यह समझा जाता है कि दिव्य प्रयत्न, अथवा योग का अभ्यास, कभी व्यर्थ नहीं जाता। भगवान् की कृपा से योगी को कृष्णभावनामृत में पूर्ण सिद्धि हेतु बार-बार अवसर प्राप्त होते हैं।