अध्याय 6 · 39 / 42
6.44
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥ ४४ ॥
पूर्व—पूर्व; अभ्यासेन—अभ्यास द्वारा; तेन—उसके प्रभाव से; एव—निश्चय ही; ह्रियते—आकृष्ट होता है; हि—निश्चय ही; अवशः—विवश; अपि—भी; सः—वह; जिज्ञासुः—जानने का इच्छुक; अपि—भी; योगस्य—योग का; शब्द-ब्रह्म—शास्त्र के कर्मकाण्डीय सिद्धान्त; अतिवर्तते—पार कर जाता है।
अपने पूर्व जीवन की दिव्य चेतना के प्रभाव से, वह स्वतः ही योग के सिद्धान्तों के प्रति आकृष्ट हो जाता है—बिना उन्हें खोजे भी। योग के लिए प्रयत्नशील ऐसा जिज्ञासु योगी सदा शास्त्र के कर्मकाण्डीय सिद्धान्तों से ऊपर स्थित रहता है।
उन्नत योगी शास्त्र के कर्मकाण्डों के प्रति अधिक आकृष्ट नहीं होते, अपितु वे स्वतः ही योग के उन सिद्धान्तों के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं, जो उन्हें पूर्ण कृष्णभावनामृत अर्थात् योग की सर्वोच्च सिद्धि तक उन्नत कर सकते हैं। श्रीमद्भागवत (3.33.8) में उन्नत योगियों द्वारा वैदिक कर्मकाण्डों की ऐसी उपेक्षा की इस प्रकार व्याख्या की गई है :
aho bata śvapaco ‘to garīyān
yajjihvāgre vartate nāma tubhyam
tepus tapas te juhuvuḥ sasnur āryā
brahmānūcur nāma gṛṇanti ye te.
“हे प्रभु! जो व्यक्ति आपके पवित्र नामों का कीर्तन करते हैं, वे आध्यात्मिक जीवन में अत्यन्त, अत्यन्त उन्नत हैं, भले ही वे श्वपच (कुत्ता खाने वालों) के कुलों में जन्मे हों। ऐसे कीर्तनकर्ताओं ने निःसन्देह समस्त प्रकार की तपस्याएँ तथा यज्ञ सम्पन्न किए हैं, समस्त पवित्र स्थानों में स्नान किया है, और समस्त शास्त्रीय अध्ययन पूर्ण किए हैं।”
इसका सुप्रसिद्ध उदाहरण भगवान् चैतन्य ने प्रस्तुत किया, जिन्होंने ठाकुर हरिदास को अपने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शिष्यों में से एक रूप में स्वीकार किया। यद्यपि ठाकुर हरिदास ने एक मुसलमान परिवार में जन्म लिया था, तथापि उन्हें भगवान् चैतन्य द्वारा नामाचार्य के पद पर प्रतिष्ठित किया गया, क्योंकि वे प्रतिदिन भगवान् के तीन लाख पवित्र नामों के जप के सिद्धान्त का दृढ़ता से पालन करते थे : हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। और चूँकि वे निरन्तर भगवान् के पवित्र नाम का जप करते थे, अतः यह समझा जाता है कि अपने पूर्व जीवन में वे अवश्य ही वेदों की समस्त कर्मकाण्डीय विधियों से, जिन्हें शब्द-ब्रह्म कहा जाता है, गुज़रे होंगे। अतः जब तक मनुष्य शुद्ध नहीं होता, तब तक वह न तो कृष्णभावनामृत के सिद्धान्त को ग्रहण कर सकता है और न भगवान् के पवित्र नाम—हरे कृष्ण—के जप में संलग्न हो सकता है।