अध्याय 6 · 40 / 42
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प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ ४५ ॥
प्रयत्नात्—कठोर अभ्यास द्वारा; यतमानः—जो प्रयत्न करता है; तु—किन्तु; योगी—ऐसा योगी; संशुद्ध—धुले हुए; किल्बिषः—समस्त प्रकार के पाप; अनेक—अनेकानेक; जन्म—जन्म; संसिद्धः—इस प्रकार सिद्धि प्राप्त; ततः—तत्पश्चात्; याति—प्राप्त करता है; पराम्—सर्वोच्च; गतिम्—गन्तव्य।
किन्तु जब योगी निष्ठापूर्वक प्रयत्न के साथ और अधिक उन्नति करने में संलग्न होता है, समस्त कल्मषों से धुलकर, तब अन्ततः, अनेकानेक जन्मों के अभ्यास के पश्चात्, वह परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।
जो व्यक्ति किसी विशेष रूप से धर्मपरायण, कुलीन अथवा पवित्र परिवार में जन्म लेता है, वह योग-अभ्यास के निर्वाह हेतु अपनी अनुकूल स्थिति के प्रति सचेत हो जाता है। अतः दृढ़ संकल्प के साथ वह अपने अधूरे कार्य का आरम्भ करता है, और इस प्रकार वह स्वयं को समस्त भौतिक कल्मषों से पूर्णतः शुद्ध कर लेता है। जब वह अन्ततः समस्त कल्मषों से मुक्त हो जाता है, तब वह सर्वोच्च सिद्धि—कृष्णभावनामृत—को प्राप्त करता है। कृष्णभावनामृत समस्त कल्मषों से मुक्त हो जाने की पूर्ण अवस्था है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में होती है :
yeṣāṁ tvanta-gataṁ pāpaṁ janānāṁ puṇya-karmaṇām
te dvandva-moha-nirmuktā bhajante māṁ dṛḍha-vratāḥ
“अनेकानेक जन्मों तक पुण्य कर्म करने के पश्चात्, जब मनुष्य समस्त कल्मषों से तथा समस्त मोहमयी द्वैतताओं से पूर्णतः मुक्त हो जाता है, तब वह भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न हो जाता है।”