हि

अध्याय 6 · 41 / 42

6.46

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६ ॥

तपस्विभ्यः—तपस्वी से; अधिकः—श्रेष्ठ; योगी—योगी; ज्ञानिभ्यः—ज्ञानी से; अपि—भी; मतः—माना गया; अधिकः—श्रेष्ठ; कर्मिभ्यः—सकाम कर्मी से; च—भी; अधिकः—श्रेष्ठ; योगी—योगी; तस्मात्—अतः; योगी—योगी; भव—बनो; अर्जुन—हे अर्जुन।

योगी तपस्वी से श्रेष्ठ है, ज्ञानी से श्रेष्ठ है, तथा सकाम कर्मी से श्रेष्ठ है। अतः हे अर्जुन! समस्त परिस्थितियों में, योगी बनो।

जब हम योग की बात करते हैं, तो हमारा तात्पर्य अपनी चेतना को परम परब्रह्म से जोड़ने से होता है। ऐसी प्रक्रिया को विभिन्न अभ्यासियों द्वारा, अपनाई गई विशेष विधि के अनुसार, भिन्न-भिन्न नाम दिए जाते हैं। जब यह जोड़ने की प्रक्रिया प्रधानतः सकाम कर्मों में होती है, तो उसे कर्मयोग कहते हैं; जब यह प्रधानतः अनुभवपरक होती है, तो उसे ज्ञानयोग कहते हैं; और जब यह प्रधानतः परमेश्वर के साथ भक्तिमय सम्बन्ध में होती है, तो उसे भक्तियोग कहते हैं। भक्तियोग अथवा कृष्णभावनामृत समस्त योगों की परम सिद्धि है, जैसा कि अगले श्लोक में समझाया जाएगा। भगवान् ने यहाँ योग की श्रेष्ठता की पुष्टि की है, किन्तु उन्होंने यह नहीं कहा कि यह भक्तियोग से श्रेष्ठ है। भक्तियोग पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान है, और इस प्रकार, कोई भी वस्तु इससे श्रेष्ठ नहीं हो सकती। आत्म-ज्ञान के बिना तपस्या अपूर्ण है। परमेश्वर के प्रति शरणागति के बिना अनुभवपरक ज्ञान भी अपूर्ण है। और कृष्णभावनामृत के बिना सकाम कर्म समय का अपव्यय है। अतः यहाँ वर्णित योग-साधना का सर्वाधिक प्रशंसित रूप भक्तियोग है, और इसकी और भी स्पष्ट व्याख्या अगले श्लोक में की गई है।