हि

अध्याय 8 · 12 / 28

8.12

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूध्न्र्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ १२ ॥

सर्व-द्वाराणि—शरीर के समस्त द्वार; संयम्य—संयमित करके; मनः—मन; हृदि—हृदय में; निरुध्य—अवरुद्ध करके; च—भी; मूर्ध्नि—शीश पर; आधाय—स्थिर करके; आत्मनः—आत्मा का; प्राणम्—प्राणवायु; आस्थितः—स्थित; योग-धारणाम्—योग की स्थिति।

योग की स्थिति समस्त ऐन्द्रिक प्रवृत्तियों से अनासक्ति की स्थिति है। इन्द्रियों के समस्त द्वारों को बन्द करके तथा मन को हृदय में और प्राणवायु को शीश के शिखर पर स्थिर करके मनुष्य अपने को योग में स्थापित करता है।

योग का अभ्यास करने हेतु, जैसा यहाँ सुझाया गया है, मनुष्य को सर्वप्रथम समस्त इन्द्रियभोग का द्वार बन्द करना होता है। इस अभ्यास को प्रत्याहार कहा जाता है, अर्थात् इन्द्रियों को इन्द्रिय-विषयों से खींच लेना। ज्ञान प्राप्त करने वाली इन्द्रियाँ, जैसे नेत्र, कान, नासिका, जिह्वा तथा त्वचा, पूर्ण रूप से संयमित की जानी चाहिए और उन्हें आत्म-तृप्ति में संलग्न होने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। इस प्रकार मन हृदय में स्थित परमात्मा पर केन्द्रित होता है और प्राणशक्ति शीश के शिखर पर उठाई जाती है। छठे अध्याय में इस प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन है। किन्तु जैसा पहले उल्लेख किया गया है, यह अभ्यास इस युग में व्यावहारिक नहीं है। सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया कृष्णभावनामृत है। यदि कोई भक्ति में अपना मन सदैव श्रीकृष्ण पर स्थिर करने में समर्थ है, तो उसके लिए अविचलित दिव्य समाधि में, अर्थात् समाधि में, स्थित रहना अत्यन्त सरल है।