हि

अध्याय 8 · 13 / 28

8.13

ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥

ओम्—अक्षरों का संयोग, ओंकार; इति—इस प्रकार; एक-अक्षरम्—परम, अविनाशी; ब्रह्म—परब्रह्म; व्याहरन्—उच्चारण करते हुए; माम्—मुझको (श्रीकृष्ण को); अनुस्मरन्—स्मरण करते हुए; यः—जो कोई; प्रयाति—प्रस्थान करता है; त्यजन्—त्यागते हुए; देहम्—इस शरीर को; सः—वह; याति—प्राप्त करता है; परमाम्—परम; गतिम्—गन्तव्य।

इस योगाभ्यास में स्थित होकर तथा अक्षरों के परम संयोग, ओम् इस पवित्र अक्षर का उच्चारण करते हुए, यदि कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का चिन्तन करता है और अपना शरीर त्यागता है, तो वह निश्चय ही आध्यात्मिक लोकों को प्राप्त करेगा।

यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ओम्, ब्रह्म तथा भगवान् श्रीकृष्ण भिन्न नहीं हैं। श्रीकृष्ण की निराकार ध्वनि ओम् है, किन्तु हरे कृष्ण ध्वनि में ओम् सम्मिलित है। इस युग में स्पष्ट रूप से अनुशंसा है कि यदि कोई इस जीवन के अन्त में हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करते हुए अपना शरीर त्यागता है, तो वह आध्यात्मिक लोकों को प्राप्त करेगा। इसी प्रकार, जो श्रीकृष्ण के भक्त हैं, वे कृष्णलोक अथवा गोलोक वृन्दावन में प्रवेश करते हैं, जबकि निर्विशेषवादी ब्रह्मज्योति में रह जाते हैं। साकारवादी आध्यात्मिक आकाश में वैकुण्ठ नामक अनेक असंख्य लोकों में भी प्रवेश करते हैं।