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अध्याय 8 · 14 / 28

8.14

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥

अनन्य-चेताः—विचलन रहित; सततम्—सदैव; यः—जो कोई; माम्—मुझको (श्रीकृष्ण को); स्मरति—स्मरण करता है; नित्यशः—नियमित रूप से; तस्य—उसके लिए; अहम्—मैं हूँ; सुलभः—प्राप्त करने में अत्यन्त सरल; पार्थ—हे पृथापुत्र; नित्य—नियमित रूप से; युक्तस्य—संलग्न; योगिनः—भक्त के लिए।

हे पृथापुत्र, जो विचलन रहित होकर मेरा स्मरण करता है, उसके लिए मैं सरलता से प्राप्य हूँ, क्योंकि वह भक्ति में निरन्तर संलग्न रहता है।

इस श्लोक में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अनन्य भक्तों के भक्तियोग का वर्णन है। पूर्ववर्ती श्लोकों में चार प्रकार के भक्तों का उल्लेख है—आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा कल्पनावादी दार्शनिक। भौतिक बन्धन से मुक्ति की विभिन्न प्रक्रियाओं का भी वर्णन हुआ है: कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा हठयोग। किन्तु यहाँ इनके किसी मिश्रण के बिना, भक्तियोग का उल्लेख है। भक्तियोग में भक्तगण श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी वस्तु की इच्छा नहीं करते। शुद्ध भक्त न तो स्वर्गलोकों में उन्नति की इच्छा करता है, न ही भौतिक बन्धन से मोक्ष अथवा मुक्ति चाहता है। शुद्ध भक्त किसी वस्तु की इच्छा नहीं करता। चैतन्य-चरितामृत में शुद्ध भक्त को निष्काम कहा गया है, जिसका अर्थ है कि उसे स्वार्थ की कोई इच्छा नहीं है। पूर्ण शान्ति केवल उसी की है, उनकी नहीं जो व्यक्तिगत लाभ के लिए प्रयत्न करते हैं। शुद्ध भक्त केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहता है, अतः भगवान् कहते हैं कि जो कोई अविचल रूप से उनके प्रति समर्पित है, उसके लिए वे सरलता से प्राप्य हैं। भक्त परमेश्वर के किसी भी दिव्य रूप की सेवा कर सकता है, और उसे उन समस्याओं में से किसी का सामना नहीं करना पड़ता जो अन्य योगों के साधकों को कष्ट देती हैं। भक्तियोग अत्यन्त सरल, शुद्ध तथा सम्पन्न करने में सुगम है। मनुष्य केवल हरे कृष्ण का जप करके आरम्भ कर सकता है। श्रीकृष्ण उन पर अत्यन्त कृपालु हैं जो उनकी सेवा में संलग्न होते हैं, और वे उस भक्त की, जो पूर्ण रूप से उनके शरणागत है, विविध प्रकार से सहायता करते हैं, ताकि वह उन्हें यथारूप समझ सके। भगवान् ऐसे भक्त को पर्याप्त बुद्धि प्रदान करते हैं, ताकि अन्ततः भक्त उन्हें उनके आध्यात्मिक धाम में प्राप्त कर सके।

शुद्ध भक्त की विशेष योग्यता यह है कि वह समय अथवा स्थान का विचार किए बिना सदैव श्रीकृष्ण का चिन्तन करता है। इसमें कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। उसे कहीं भी और किसी भी समय अपनी सेवा सम्पन्न करने में समर्थ होना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि भक्त को वृन्दावन जैसे पवित्र स्थानों में अथवा किसी पवित्र नगर में, जहाँ भगवान् रहे थे, रहना चाहिए, किन्तु शुद्ध भक्त कहीं भी रह सकता है और अपनी भक्ति द्वारा वृन्दावन का वातावरण निर्मित कर सकता है। श्री अद्वैत ने ही भगवान् चैतन्य से कहा था, “हे प्रभु, जहाँ भी आप हैं—वहीं वृन्दावन है।”

शुद्ध भक्त निरन्तर श्रीकृष्ण का स्मरण करता है और उनका ध्यान करता है। ये शुद्ध भक्त की वे योग्यताएँ हैं, जिनके कारण भगवान् उसे अत्यन्त सरलता से प्राप्य हैं। भक्तियोग वह प्रणाली है जिसकी गीता सबसे ऊपर अनुशंसा करती है। सामान्यतः भक्तियोगी पाँच विभिन्न रीतियों में संलग्न रहते हैं: 1) शान्त-भक्त, तटस्थता में भक्ति में संलग्न; 2) दास्य-भक्त, सेवक के रूप में भक्ति में संलग्न; 3) सख्य-भक्त, मित्र के रूप में संलग्न; 4) वात्सल्य-भक्त, माता-पिता के रूप में संलग्न; और 5) माधुर्य-भक्त, परमेश्वर के दाम्पत्य प्रेमी के रूप में संलग्न। इनमें से किसी भी रीति में शुद्ध भक्त सदैव परमेश्वर की दिव्य प्रेममयी सेवा में निरन्तर संलग्न रहता है और परमेश्वर को विस्मृत नहीं कर सकता, अतः उसके लिए भगवान् सरलता से प्राप्य हैं। शुद्ध भक्त एक क्षण के लिए भी परमेश्वर को विस्मृत नहीं कर सकता, और इसी प्रकार परमेश्वर भी एक क्षण के लिए अपने शुद्ध भक्त को विस्मृत नहीं कर सकते। हरे कृष्ण महामन्त्र के जप की कृष्णभावनामृत-प्रक्रिया का यही महान् आशीर्वाद है।