हि

अध्याय 8 · 16 / 28

8.16

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥

आब्रह्म—ब्रह्मलोक तक; भुवनात्—लोक-समूहों से; लोकाः—लोक; पुनः—पुनः; आवर्तिनः—लौटने वाले; अर्जुन—हे अर्जुन; माम्—मुझको; उपेत्य—प्राप्त करके; तु—किन्तु; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; पुनः जन्म—पुनर्जन्म; न—कभी नहीं; विद्यते—होता है।

भौतिक जगत् के सर्वोच्च लोक से लेकर निम्नतम लोक तक, सभी दुःख के स्थान हैं, जहाँ बारम्बार जन्म-मृत्यु होती रहती है। किन्तु हे कुन्तीपुत्र, जो मेरे धाम को प्राप्त कर लेता है, वह पुनः कभी जन्म नहीं लेता।

कर्म, ज्ञान, हठ आदि सभी प्रकार के योगियों को कृष्ण के दिव्य धाम में जाने तथा वहाँ से कभी न लौटने से पूर्व अन्ततः भक्तियोग, अर्थात् कृष्णभावनामृत में भक्ति की पूर्णता प्राप्त करनी ही पड़ती है। जो सर्वोच्च भौतिक लोकों अथवा देवताओं के लोकों को प्राप्त करते हैं, वे पुनः बारम्बार जन्म-मृत्यु के अधीन हो जाते हैं। जिस प्रकार पृथ्वी के व्यक्ति उच्चतर लोकों को उठाए जाते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मलोक, चन्द्रलोक तथा इन्द्रलोक जैसे उच्चतर लोकों के निवासी पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। कठोपनिषद् में अनुशंसित पञ्चाग्नि-विद्या नामक यज्ञ का अभ्यास मनुष्य को ब्रह्मलोक प्राप्त करा सकता है, किन्तु यदि ब्रह्मलोक में मनुष्य कृष्णभावनामृत का अनुशीलन नहीं करता, तो उसे पृथ्वी पर लौटना ही पड़ता है। जो उच्चतर लोकों में कृष्णभावनामृत में प्रगति करते हैं, वे क्रमशः उच्चतर एवं उच्चतर लोकों तक उठाए जाते हैं और विश्व-प्रलय के समय नित्य आध्यात्मिक राज्य में स्थानान्तरित कर दिए जाते हैं। जब इस भौतिक ब्रह्माण्ड का प्रलय होता है, तब ब्रह्मा तथा उनके भक्तगण, जो निरन्तर कृष्णभावनामृत में संलग्न रहते हैं, सभी आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड में तथा अपनी इच्छाओं के अनुसार विशिष्ट आध्यात्मिक लोकों में स्थानान्तरित कर दिए जाते हैं।