हि

अध्याय 8 · 3 / 28

8.3

श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥

श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; अक्षरम्—अविनाशी; ब्रह्म—ब्रह्म; परमम्—दिव्य; स्वभावः—नित्य स्वभाव; अध्यात्मम्—आत्मा; उच्यते—कहलाता है; भूत-भाव-उद्भव-करः—जीवों के भौतिक शरीरों को उत्पन्न करने वाली क्रिया; विसर्गः—सृष्टि; कर्म—सकाम कर्म; संज्ञितः—कहलाता है।

परमेश्वर ने कहा, अविनाशी, दिव्य जीव ब्रह्म कहलाता है, और उसका नित्य स्वभाव आत्मा कहलाता है। इन भौतिक शरीरों के विकास से सम्बद्ध क्रिया कर्म अर्थात् सकाम कर्म कहलाती है।

ब्रह्म अविनाशी तथा नित्य विद्यमान है, और उसका स्वरूप किसी भी समय परिवर्तित नहीं होता। किन्तु ब्रह्म के परे परब्रह्म है। ब्रह्म से अभिप्राय जीव से है, और परब्रह्म से अभिप्राय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से है। जीव की स्वरूपगत स्थिति उस स्थिति से भिन्न है, जो वह भौतिक जगत् में ग्रहण करता है। भौतिक चेतना में उसका स्वभाव पदार्थ का स्वामी बनने का प्रयत्न करना है, किन्तु आध्यात्मिक (कृष्ण) चेतना में उसकी स्थिति परमेश्वर की सेवा करना है। जब जीव भौतिक चेतना में रहता है, तब उसे भौतिक जगत् में विविध शरीर ग्रहण करने पड़ते हैं। इसे ही कर्म कहा जाता है, अर्थात् भौतिक चेतना के बल से विविध सृष्टि।

वैदिक साहित्य में जीव को जीवात्मा तथा ब्रह्म कहा जाता है, किन्तु उसे कभी परब्रह्म नहीं कहा जाता। जीव (जीवात्मा) भिन्न-भिन्न स्थितियाँ ग्रहण करता है—कभी वह अन्धकारमय भौतिक प्रकृति में लीन हो जाता है और अपने को पदार्थ के साथ तदात्म कर लेता है, और कभी अपने को श्रेष्ठ आध्यात्मिक प्रकृति के साथ तदात्म करता है। अतः उसे परमेश्वर की तटस्थ शक्ति कहा जाता है। भौतिक अथवा आध्यात्मिक प्रकृति के साथ अपने तादात्म्य के अनुसार वह भौतिक अथवा आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करता है। भौतिक प्रकृति में वह चौरासी लाख योनियों में से किसी भी योनि में शरीर ग्रहण कर सकता है, किन्तु आध्यात्मिक प्रकृति में उसका केवल एक ही शरीर होता है। भौतिक प्रकृति में वह अपने कर्म के अनुसार कभी मनुष्य, देवता, पशु, हिंस्र प्राणी, पक्षी आदि के रूप में प्रकट होता है। भौतिक स्वर्गलोकों को प्राप्त करने तथा उनकी सुविधाओं का भोग करने के लिए वह कभी-कभी यज्ञ सम्पन्न करता है, किन्तु जब उसका पुण्य क्षीण हो जाता है, तब वह पुनः मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर लौट आता है।

यज्ञ की प्रक्रिया में जीव विशिष्ट स्वर्गलोकों को प्राप्त करने हेतु विशिष्ट यज्ञ करता है और फलस्वरूप उन्हें प्राप्त करता है। जब यज्ञ का पुण्य क्षीण हो जाता है, तब जीव वर्षा के रूप में पृथ्वी पर उतरता है, फिर अन्न का रूप धारण करता है, और वह अन्न मनुष्य द्वारा खाया जाकर वीर्य में परिणत होता है, जो स्त्री को गर्भवती करता है, और इस प्रकार जीव पुनः यज्ञ करने हेतु मानव रूप प्राप्त करता है और इस प्रकार वही चक्र दोहराता है। इस रीति से जीव भौतिक मार्ग पर निरन्तर आता-जाता रहता है। किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ऐसे यज्ञों से बचता है। वह सीधे कृष्णभावनामृत को ग्रहण करता है और इस प्रकार भगवद्धाम लौटने हेतु अपने को तैयार करता है।

गीता पर निर्विशेषवादी भाष्यकार अकारण यह मान लेते हैं कि ब्रह्म भौतिक जगत् में जीव का रूप धारण कर लेता है, और इसकी पुष्टि हेतु वे गीता के पन्द्रहवें अध्याय के सातवें श्लोक का सन्दर्भ देते हैं। किन्तु यह श्लोक भी जीव को “मेरा ही नित्य अंश” कहता है। भगवान् का अंश, जीव, भौतिक जगत् में पतित हो सकता है, किन्तु परमेश्वर (अच्युत) कभी पतित नहीं होते। अतः यह मान्यता कि परब्रह्म जीव का रूप धारण कर लेता है, स्वीकार्य नहीं है। यह स्मरण रखना महत्त्वपूर्ण है कि वैदिक साहित्य में ब्रह्म (जीव) को परब्रह्म (परमेश्वर) से पृथक् माना गया है।