हि

अध्याय 8 · 4 / 28

8.4

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ४ ॥

अधिभूतम्—भौतिक प्रकटीकरण; क्षरः—निरन्तर परिवर्तनशील; भावः—प्रकृति; पुरुषः—विराट् रूप; च—तथा; अधिदैवतम्—सूर्य तथा चन्द्र जैसे समस्त देवताओं सहित; अधियज्ञः—परमात्मा; अहम्—मैं (श्रीकृष्ण); एव—निश्चय ही; अत्र—इसमें; देहे—शरीर में; देह-भृताम्—देहधारियों के; वर—हे परम।

भौतिक प्रकृति अनन्त रूप से परिवर्तनशील जानी जाती है। यह विश्व परमेश्वर का विराट् रूप है, और मैं वही भगवान् हूँ, जो परमात्मा के रूप में प्रत्येक देहधारी प्राणी के हृदय में निवास करता हुआ अभिव्यक्त है।

भौतिक प्रकृति निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। भौतिक शरीर सामान्यतः छह अवस्थाओं से होकर गुज़रते हैं: वे जन्म लेते हैं, बढ़ते हैं, कुछ काल तक स्थिर रहते हैं, कुछ उपजात उत्पन्न करते हैं, क्षीण होते हैं, और तब लुप्त हो जाते हैं। इस भौतिक प्रकृति को अधिभूत कहा जाता है। चूँकि इसकी सृष्टि एक निश्चित बिन्दु पर होती है और एक निश्चित बिन्दु पर इसका संहार होगा, अतः परमेश्वर के उस विराट् रूप की धारणा, जिसमें समस्त देवता तथा उनके विभिन्न लोक सम्मिलित हैं, अधिदैवत कहलाती है। व्यष्टि आत्मा (जीव) शरीर के साथ रहती है। भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण प्रतिनिधि परमात्मा, परमात्मा अथवा अधियज्ञ कहलाता है और हृदय में स्थित रहता है। इस श्लोक के सन्दर्भ में एव शब्द विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इस शब्द द्वारा भगवान् बल देते हैं कि परमात्मा उनसे भिन्न नहीं है। परमात्मा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, व्यष्टि आत्मा के निकट विराजमान होकर व्यष्टि आत्मा की क्रियाओं का साक्षी है तथा चेतना का स्रोत है। परमात्मा जीव को स्वतन्त्र रूप से कर्म करने का अवसर देता है, और वह उसकी क्रियाओं का साक्षी होता है। परमेश्वर के इन सभी विभिन्न प्रकटीकरणों के कार्य भगवान् की दिव्य सेवा में संलग्न शुद्ध कृष्णभावनाभावित भक्त के लिए स्वतः स्पष्ट हो जाते हैं। भगवान् का विराट् विश्व-रूप, जो अधिदैवत कहलाता है, उस नवदीक्षित द्वारा चिन्तन किया जाता है, जो परमात्मा के रूप में अपने प्रकटीकरण में परमेश्वर के पास नहीं पहुँच सकता। नवदीक्षित को उस विराट् रूप का चिन्तन करने का परामर्श दिया जाता है, जिसके चरण निम्नतर लोक माने जाते हैं, जिसके नेत्र सूर्य तथा चन्द्र माने जाते हैं, और जिसका शीश उच्चतर ग्रहमण्डल माना जाता है।