हि

अध्याय 8 · 5 / 28

8.5

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥

अन्त-काले—जीवन के अन्त में; च—भी; माम्—मुझको; एव—निश्चय ही; स्मरन्—स्मरण करते हुए; मुक्त्वा—त्यागकर; कलेवरम्—शरीर; यः—जो; प्रयाति—जाता है; सः—वह; मद्-भावम्—मेरी प्रकृति; याति—प्राप्त करता है; न—नहीं; अस्ति—है; अत्र—यहाँ; संशयः—सन्देह।

और जो कोई मृत्यु के समय केवल मेरा ही स्मरण करते हुए अपना शरीर त्यागता है, वह तत्क्षण मेरी प्रकृति प्राप्त करता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है।

इस श्लोक में कृष्णभावनामृत के महत्त्व पर बल दिया गया है। जो कोई कृष्णभावनामृत में अपना शरीर त्यागता है, वह तत्क्षण परमेश्वर के दिव्य धाम में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। स्मरन् (स्मरण करते हुए) शब्द महत्त्वपूर्ण है। उस अशुद्ध आत्मा के लिए श्रीकृष्ण का स्मरण सम्भव नहीं है, जिसने भक्ति में कृष्णभावनामृत का अभ्यास नहीं किया है। श्रीकृष्ण का स्मरण करने हेतु मनुष्य को भगवान् चैतन्य के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए, वृक्ष से अधिक सहनशील, तृण से अधिक विनम्र होकर तथा बदले में सम्मान की अपेक्षा किए बिना दूसरों को समस्त सम्मान अर्पित करते हुए, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, इस महामन्त्र का निरन्तर जप करना चाहिए। इस प्रकार मनुष्य श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए शरीर से सफलतापूर्वक प्रस्थान कर सकेगा और इस प्रकार परम लक्ष्य प्राप्त कर सकेगा।