अध्याय 8 · 6 / 28
8.6
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥
यम् यम्—जो भी; वा—अथवा; अपि—भी; स्मरन्—स्मरण करते हुए; भावम्—प्रकृति; त्यजति—त्यागता है; अन्ते—अन्त में; कलेवरम्—इस शरीर को; तम् तम्—उसी प्रकार; एव—निश्चय ही; एति—प्राप्त करता है; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; सदा—सदैव; तत्—उस; भाव—भाव की; भावितः—स्मरण करते हुए।
मनुष्य शरीर त्यागते समय जिस किसी भाव का स्मरण करता है, वह उसी भाव को अवश्य प्राप्त करता है।
मृत्यु के संकटपूर्ण क्षण में अपनी प्रकृति बदलने की प्रक्रिया यहाँ समझाई गई है। मनुष्य उचित मनःस्थिति में किस प्रकार मर सकता है? महाराज भरत ने मृत्यु के समय एक मृग का चिन्तन किया और इस प्रकार उसी योनि में स्थानान्तरित हो गए। तथापि मृग होने पर भी महाराज भरत अपने पूर्व कर्मों का स्मरण रख सके। निःसन्देह मनुष्य के जीवन के विचारों तथा कर्मों का संचित प्रभाव मृत्यु के क्षण में उसके विचारों को प्रभावित करता है; अतः इस जीवन के कर्म ही मनुष्य के भावी भाव का निर्धारण करते हैं। यदि कोई दिव्य रूप से श्रीकृष्ण की सेवा में तल्लीन है, तो उसका अगला शरीर दिव्य (आध्यात्मिक) होगा, भौतिक नहीं। अतः अपने भाव को सफलतापूर्वक दिव्य जीवन में बदलने हेतु हरे कृष्ण का जप ही सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया है।